श्रीगंगानगर- गर्मी में तपती सड़क। नंगे
पांव। सिर पर दो-चार किलो वजन और कई किलोमीटर का सफर। पांव में छाले तो होने ही
थे। ऐसा ही हुआ अनेक महिलाओं के साथ। वह भी महिला दिवस
पर। ये सब शिवरात्री के उपलक्ष
में आयोजित शोभायात्रा में शामिल थीं। यह शोभायात्रा नहर किनारे के शिव मंदिर से
रवाना हुई। इसमें कई सौ महिलाएं [किशोरी,युवतियाँ,विवाहिता] सिर
पर कलश लेकर शामिल हुईं। शोभायात्रा बहुत ही विशाल और भब्य थी हर साल की तरह।
शोभायात्रा जब बाजार से होकर निकली तो चारों तरफ ट्रैफिक अस्त व्यस्त हो गया।
क्योंकि इसकी लंबाई इतनी थी कि कई सड़कों पर आवाजाही लगभग रुक सी गई। सड़क क्रॉस
करने के लिए महिलाओं के बीच में से जाना उचित नहीं होता। इसलिए लोग यात्रा के गुजर
जाने का इंतजार करते। किन्तु जब यात्रा का अंतिम छोर नहीं दिखता तो वे इधर उधर से
निकलते तो फिर किसी दूसरी सड़क पर वही हाल। ऐसी
ही स्थिति ब्लॉक एरिया में हुई। तब तक कई घंटे हो चुके थे महिलाओं को तपती सड़क प
र्नंगे पाँव चलते हुए। कहीं किसी पेड़ की छांव में खड़े होने की कोशिश कोई महिला
करती भी तो आयोजक उसे वापिस लाइन में ले आते। गरम सड़क पर नंगे पांव चलने के कारण
अनेकानेक महिलाओं के पांव में चाले हो गए। यह केवल कल्पना नहीं। आयोजक शोभायात्रा
में शामिल महिलाओं के पांव देखें तो उयांकों मालूम हो जाएगा कि कितनी महिलाओं के
पैरो में क्या हुआ। लेकिन शायद आयोजकों को इस्स एकोई मतलब नहीं था।
उधर प्रशासन को भी बड़ी बड़ी यात्रा का कोई रूट फिक्स करना चाहिए ताकि नगर के
बाज़ारों में ट्रैफिक व्यवस्था बनी रहे। लोगों को अधिक परेशानी का सामना ना करना
पड़े। हालांकि शोभायात्रा के दौरान पानी का पूरा प्रबंध था। इसके अलावा अनेक
स्थानों पर भी लोगों ने पानी का इंतजाम कर रखा था। इस इंतजाम के कारण सैकड़ों
प्लास्टिक के गिलास सड़कों पर बिखरे पड़े रहे।
Saturday, March 9, 2013
Wednesday, March 6, 2013
पांच लाख रुपए में पड़ा नेताओं का “न्याय”
श्रीगंगानगर-आपके संस्थान में
चाहे वह स्कूल,दुकान,हॉस्पिटल,ऑफिस,होटल,घर कुछ भी
हो,कोई
हादसा हो जाए तब आपको कई लाख रुपए देने ही पड़ेंगे। आपका कसूर है या नहीं
इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। कह दिया सो कह दिया....आपको अंटी तो ढीली करनी है, यही है
हमारे नेताओं के न्याय का मॉडर्न तरीका। नहीं तो भीड़ आपके दरवाजे
पर होगी। वह कुछ भी करने में सक्षम है। वह
आपके संस्थान की चिंदी चिंदी कर सकती है, साथ में
आपकी इज्जत की भी । इसलिए जो नेता कहें मान लो। ऐसा ही करवाया कांग्रेस नेता राज
कुमार गौड़,पूर्व
सभापति महेश पेड़ीवाल,ट्रेडर्स
एसोसिएशन के अध्यक्ष दीपक कांडा,कृषि उपज मंडी समिति के उपाध्यक्ष राजेश पोखरना,कच्चा
आढ़तिया संघ के अध्यक्ष पुरुषोत्तम गोयल,सारस्वत कुंडिया समाज के अध्यक्ष बजरंग औझा सहित कई
नेताओं ने। स्कूल में बच्चों की मारपीट हुई। एक बच्चा घायल हुआ। मारपीट करने वाले
भी पकड़े गए। कसूर! पूरा का पूरा कसूर स्कूल संचालकों,टीचर्स
और स्टाफ का। इसके लिए देना होगा “आर्थिक सहयोग”।{इलाज का पूरा खर्चा तो अलग है ही।}वरना
तो....। श्री गौड़ और श्री पेड़ीवाल
कांग्रेस और बीजेपी की टिकट पर विधानसभा का चुनाव लड़ चुके हैं, बहुत
लंबा राजनीतिक जीवन है इनका। एक नागरिक को इनसे कोई सवाल करने का हक नहीं है। फिर डरते
डरते गुस्ताखी कर ही लेता हूं । सवाल
ये कि आखिर उन्होने स्कूल पर पांच लाख रुपए का दंड
किस बात का लगाया ? अगर
स्कूल कसूरवार है तो क्या पांच लाख रुपए में उसका कसूर माफी लायक हो गया? कसूर
है तो स्कूल को “फांसी” पर
लटकाओ। पांच लाख रुपए में उसे माफ करने वाले ये नेता
कौन होते हैं। दूसरा सवाल जिन बच्चों पर मारपीट का आरोप है उनके परिजनों पर क्या “दंड” लगाया
इन नेताओं की “पंचायत” ने। उनको
कानून सजा देगा! जो कानून उनको सजा देगा वह स्कूल को भी दो दे सकता है। उनको तो इन
नेताओं ने अपनी इस “पंचायत’ में
बुलाया तक नहीं। न्याय की क्या शानदार मिसाल पेश की है इन हमारे
नेताओं ने!शुक्र करो ये नेता विधानसभा नहीं पहुंचे वरना तो “न्याय” की
परिभाषा ही बदल जाती। क्षेत्र में शिक्षण संस्थाओं की कोई कमी नहीं है। बच्चों में
छोटे मोटे विवाद भी स्वाभाविक बात है। ऐसे विवादों को निपटाने ये नेता पहुँच गए तो
उसी को “न्याय”
मिलेगा जिसकी जेब में दाम होंगे। कितनी हैरानी की बात है कि जनता इन नेताओं को
अपना शुभचिंतक,हितचिंतक,न्यायप्रिय,संवेदनशील,शुभचिंतक
समझती है। सलाम ऐसा न्यायप्रिय नेताओं को और भीड़ को जिनके दम पर ये कैसा भी न्याय
करने की शक्ति प्राप्त करते हैं।शान
Tuesday, March 5, 2013
मौत,आक्रोश,गुस्सा,हंगामा,वार्ता और समझौता
श्रीगंगानगर-एक बकरी उम्मीद से थी। उसे गायनी के पास लाया गया। हालत खराब हो गई। सीजेयरीयन डिलीवरी से ट्विन हुए। स्थिति और बिगड़ गई। खूब कोशिश की हॉस्पिटल वालों ने...लेकिन जो ईश्वर को मंजूर। ट्विन बच गए। जैसे ही परिजनों को पता लगा हंगामा हो गया। बात एक से होती हुई दूसरे,तीसरे....आगे बढ़ी। बात आगे बढ़ी तो उसकी सूरत बदल गई। बकरी की नसल का सवाल आया। रंग की पूछताछ हुई। जिसकी थी,वह किस समुदाय और जाति का है इसका पता लगाया गया। धर्म के बारे में पूछा। ट्विन की स्थिति कैसी है...ये जानकारी ली गई। हॉस्पिटल के बाहर भीड़ अधिक हो चुकी है। नगर में चर्चाओं का बाजार गरम....अफवाहों का दौर.... पुलिस हॉस्पिटल पहुंची। प्रशासनिक अधिकारी भी पहुंचे। चुनाव आने वाले थे। अनेकानेक नेता हॉस्पिटल पहुँच गए। मालिक को ढांढस बंधाया। ट्विन के सिर पर स्नेह से हाथ फेरते हुए फोटो ले मीडिया को दिये गए। कोई बिस्कुट लेकर आया था कोई नर्म मुलायम चारा। एक ने बिन माँ के ट्विन के चारे का सहयोग करवाने का वादा किया। दूसरा सत्तारूढ पार्टी का था उसने सीधे सरकार को फैक्स कर घटना की जानकारी दे मुआवजा मांग लिया। तीसरा हॉस्पिटल के खिलाफ कार्यवाही करने की मांग करने लगा। डॉक्टर की गिरफ्तारी की बात हुई। भीड़ और अधिक हो गई। कुछ उत्तेजित लोग हॉस्पिटल के गेट की तरफ बढ़े। पुलिस मुस्तैद हुई। उस पर मिली भगत के आरोप लगे....पुलिस की हाय हाय हुई..। भीड़ में चर्चा होने लगी, क्या जरूरत थी बकरी को इधर लाने की....और कहीं ले जाते.....मुआवजा क्या होता है....बच्चे तो रूल गए....माँ कहाँ से आएगी....गरीब मालिक कैसे संभाल पाएगा....इसी दौरान जो नेता कुछ देर पहले बकरी,उसके ट्विन,मालिक की चिंता फिक्र कर रहे थे वे हॉस्पिटल के अंदर वार्ता का माहौल तैयार करने लगे। नेता अंदर गए तो बाहर नारेबाजी तेज हो गई। बकरी की डैड बॉडी ले जाने से मना कर दिया भीड़ ने। आवाज आई...”जब तक नहीं लेकर जाएंगे जब तक न्याय नहीं मिलता।“ “प्रशासन इस परिवार को अकेला ना समझे।“ मालिक कभी इधर देखे,कभी उधर...भीड़ तो बहुत लेकिन अपना कोई ना दिखे। कई घंटे के बाद समझौता वार्ता हुई। ट्विन्स के लिए उम्र चारे का इंतजाम कुछ नकदी पर समझौता हो गया। एक नेता ने मृतक के नाम सड़क का नाम रखने की घोषणा कर दी। भीड़ को बता दिया गया। भीड़ एकता के नारे लगती हुई चली गई। हॉस्पिटल वालों ने मालिक से पूछ लिया कि डैड बॉडी वह ले जाएगा या ठेकेदार। मालिक ने मना कर दिया तब हॉस्पिटल ने मृत पशुओंको उठाने ठेकेदार को सूचना दी। उसने बकरी की डैड बॉडी रेहड़ी पर डाली और उसे ले गया। पुलिस भी रवाना हो गई। नेताओं ने हॉस्पिटल संचालकों से हाथ मिलाए....कहा, चलो नक्की हुआ। सड़क पर आवागमन रोज की तरह हो गया। हॉस्पिटल में सामान्य काम काज होने लगा। ट्विन्स की उसके बाद किसी ने खैर खबर नहीं ली। बिन माँ के कब तक रहते मासूम...चले गए माँ के पास। फिर चुनाव आ गए। दैट्स ऑल। [एक व्यंग्य]
Friday, March 1, 2013
शब्दों के कलाकार अलबेला खत्री का अभिनंदन
श्रीगंगानगर-स्थानीय
राजनीति के एक बड़े कलाकार के सानिध्य में शब्दों के कलाकार का नागरिक अभिनंदन नगर परिषद
और सृजन सेवा संस्थान ने नगर परिषद सभाकक्ष में किया। राजनीति के बड़े कलाकार थे
जगदीश जांदू, जिनकी अध्यक्षता
में शब्दों के कलाकार कवि अलबेला खत्री का अभिनंदन किया गया। इस मौके पर बड़ी
संख्या में साहित्य प्रेमी उपस्थित थे। अलबेला खत्री ने अपने भाव भरे सम्बोधन में कहा कि वे आज तक मिले सभी पुरस्कार इस अभिनंदन पर न्यौछावर करते
हैं। श्रीगंगानगर से मुंबई जाकर उन्होने क्या कुछ भोगा उसका जिक्र करते हुए श्री
खत्री ने कहा कि उस स्तर पर आदमी बर्दाश्त कर ले तो उसका रास्ता रोकने वाला कोई
नहीं हो सकता। शिर खत्री ने बताया कि कामयाबी
का यह सफर किस प्रकार से आगे बढ़ा और क्या क्या दुख तकलीफ भोगने पड़ी।
उन्होने विविध प्रकार की मधुर रचनाएं
प्रस्तुत कीं। जिनका खूब आनंद उपस्थित जनों ने लिया। हर लाइन पर वाह! वाह! हुई और
तालियाँ बजाई। उनको सभापति जगदीश जांदू, बीजेपी नेता रमेश राजपाल,साहित्यकार
डॉ विद्यासागर शर्मा ने अभिनंदन स्वरूप स्मृति चिन्ह भेंट किया। उनको साफा पहनाया
गया। शॉल दी गई। डॉ कृष्ण कुमार आशू ने अलबेला खत्री का परिचय दिया। संदेश त्यागी
ने संचालन किया। इससे प्रेम चुघ,कृष्ण
स्याग,के सी शर्मा रमजान
अली चोपदार ने कार्यक्रम को संबोधित्त
किया। कार्यक्रम में पार्षद,पूर्व
पार्षद,परिषद के कर्मचारी,कई संस्थाओं से जुड़े लोग भी थे। आरंभ में
अनेकानेक व्यक्तियों ने अलबेला खत्री को फूल माला पहना कर स्वागत किया।
Thursday, February 28, 2013
ओ त्तेरी की! परीक्षा तो आतंक बन गई
श्रीगंगानगर-परीक्षा
अब आतंक बना दी गई है। इसे आतंक बनाने में सभी
का हाथ है,मीडिया का भी। किसी का कम तो किसी
का तोला-मासा अधिक। स्कूल,टीचर
से लेकर घर तक यही आतंक पसरा है इन दिनों। समझ से परे हैं कि पहले क्या कभी
परीक्षा नहीं हुई? कोई अफसर नहीं
बना! इंजीनियर नहीं हुए! बढ़िया डॉक्टर्स निकल कर नहीं आए! अच्छे नागरिकों की कमी थी! जो
आज है वह पहले भी था। फिर जरा से बच्चे से लेकर किशोर सभी इतने परीक्षा से अब इतने आतंकित क्यों हो गए। साथ में डरे सहमें हैं उनके पेरेंट्स। आराम, खाना-पीना,घूमना,मस्ती,उमंग सब के सब इस आतंक की भेंट चढ़ चुके हैं।
घरों में परीक्षा का तनाव है। पिछड़ जाने
का अंजाना भय है। रैंक में गिरावट की चिंता है।इन सबकी वजह से स्वास्थ्य
को तो हम बहुत पीछे छोड़ चुके हैं। अब कौन समझाए कि सेहत ही ठीक नहीं होगी तो चलोगे
कैसे। दिलो दिमाग पर परीक्षा हावी होगी तो जो पढ़ोगे,
वह याद कितना रहेगा। बस,किताब
आंखों के सामने और दिमाग कहीं ओर। इसमें कोई शक नहीं है कि प्रतियोगिता के इस दौर
में कोई किसी से पिछड़ना नहीं चाहता। पिछड़ना चाहिए भी नहीं। किन्तु इसका ये मतलब तो
नहीं कि इस उम्र में ही जिंदगी के आनंद,उल्लास को ही खो दें। फिर आने वाले समय में तो वैसे भी अनेक प्रकार के
आतंक हर इंसान की जिंदगी में रहेंगे। कम से कम यह उम्र तो बिना डर के निकले। परीक्षा बोझ ना बने। वह भी पढ़ाई की तरह एक सामान्य बात हो। परीक्षा का आतंक न हो दिलो दिमाग पर इसीलिए
परीक्षा से कुछ दिन पहले स्कूलों में वार्षिक उत्सव होते है। बड़ी कक्षा को विदाई
पार्टी दी जाती है। यह सब इसीलिए ताकि विद्यार्थी साल भर की पढ़ाई से हट मनोरंजन से
अपने दिमाग को रिचार्ज कर लें। मन को
प्रफुल्लित करें... खूब हंसे...मस्ती करें और
फिर परीक्षा की तैयारी में जुट जाएं। बिना
किसी बोझ के। ऐसा ही भाव विदाई पार्टी का होता है। परंतु समय ने कितना बदल दिया यह
सब ।
आज कितने पैरेंट्स होंगे जो अपने बच्चों को परीक्षा के आतंक से मुक्त रखते होंगे। होगा कोई अपवाद। वरना तो यह मौसम “पढ़ ले...पढ़ ले” कहने का ही है। खेलने...घूमने...फिल्म...टीवी
देखने का नाम लेते ही पेरेंट्स
के मुखड़े का डिजायन बदल जाता है। घरों से टीवी केबल तक हटवा देते हैं ताकि बच्चे टीवी से दूर
रहें। ऐसा करने से बच्चे पढ़ाई में बहुत आगे निकल जाएंगे ये संभव नहीं। पढ़ाई तो ठीक
है। परंतु केवल और केवल पढ़ाई उचित नहीं। हर समय....उठते,बैठते,आते,जाते,खाते,पीते बस पढ़ाई! कब तक कोई झेल सकता है। ये
पंक्ति पढ़ो दिल बहल जाएगा....मैडम जिस पर लट्टू है,वह सरकार निखट्टू है। जो मैडम को प्यारा है,वह “सरदार” नकारा है।
Saturday, February 23, 2013
कामिनी को कांग्रेस की टिकट के लिए सहयोग करेंगे-मील
श्रीगंगानगर-राजस्थान
जाट महासभा उद्योगपति बी डी अग्रवाल को कांग्रेस से जोड़ने का ना केवल समर्थन करेगी
बल्कि जरूरत हुई तो उनके पक्ष में अपनी राय भी देगी। यह बात महासभा के अध्यक्ष राजाराम
मील ने इस रिपोर्टर से कही। रिपोर्टर ने श्री मील से विभिन्न मुद्दों पर टेलीफोन पर बात
की। जमींदारा पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बी डी अग्रवाल को कांग्रेस से जोड़ने के
सवाल पर श्री मील ने कहा कि वैसे तो यह तो कांग्रेस को सोचना है। लेकिन मेरी राय
ली गई तो हम इसका समर्थन भी करेंगे और सिफ़ारिश भी। श्रीगंगानगर विधानसभा सीट से कांग्रेस पार्टी से कामिनी
जिंदल की उम्मीदवारी के बारे में श्री मील का कहना था, हम कामिनी को टिकट दिलाने में सहयोग करेंगे। उसे कांग्रेस की टिकट मिले
अच्छी बात है। ना भी मिले तो हम अच्छे उम्मीदवारों
का समर्थन करेंगे। उनको सहयोग
देना भी चाहिए। क्योंकि बी डी अग्रवाल बहुत अच्छा काम कर रहें हैं। श्री मील ने
कहा,उनकी वजह से श्रीगंगानगर में
मेडिकल कॉलेज आया। अब सूरतगढ़ क्षेत्र में रेल कोच फैक्ट्री की आवाज उठाई गई है। हनुमानगढ़
में एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी की बात है। प्रदेश के जाने माने मील परिवार को बी डी
अग्रवाल के सहारे की जरूरत क्यों पड़ गई? इसके जवाब में राजाराम मील ने कहा कि बी डी अग्रवाल की जरूरत नहीं पड़ी।
हमारा परिवार राजनीति में अपने पैरों पर खड़ा है। सूरतगढ़ में जेब से पैसा खर्च कर
लोगों के काम करवाते हैं। यह पूरे राजस्थान में एक उदाहरण है। चूंकि बी डी अग्रवाल
समाज के लिए बढ़िया काम कर रहें है इसलिए हम उसके साथ हैं। क्या मील परिवार वसुंधरा
राजे सिंधिया की संभावित सरकार से घबरा रहा है...श्री मील ने कहा कि घबराने वाली
बात नहीं है। जब वे सीएम थीं चार साल आमने सामने की लड़ाई लड़ी है हमने। हम अपने
पैरों पर खड़े हैं घबराहट बिलकुल भी नहीं है। महासभा किस पार्टी का समर्थन करती है? श्री मील का कहना था कि अभी कोई पार्टी
ज्वाइन नहीं की है। तवज्जो कहाँ मिलती है ये देखेंगे। समाज को बेनीफिट किस से मिलेगा यह
देखेंगे। हमारा कोई व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं
है। पहले तीन बार बीजेपी का समर्थन किया था। उसके बाद
दो बार कांग्रेस का। फिलहाल अभी तय नहीं किया कि किसका समर्थन करेंगे। महासभा 24 घंटे सक्रिय है। लोगों के काम आती
है। राजा राम मील सूरतगढ़ के विधायक गंगाजल मील के भाई हैं। गत कई दिनों से मील
परिवार और महासभा बी डी अग्रवाल के बहुत अधिक निकट हैं।
Wednesday, February 20, 2013
जरूरी नहीं है बी डी की बंद मुट्ठी का खुलना
श्रीगंगानगर-सत्ता
के प्रतीक सांसद,विधायक हाथ
बांधे बैठे/खड़े हों। प्रशासन जिससे मिलने को लालायित हो। मीडिया से जुड़े अधिकांश
व्यक्ति ओबलीगेशन के तलबगार हों। जन-जन जिसमें असीम संभावना देख रहा हो। वक्त
जिसकी मुट्ठी में हो। ऐसा व्यक्ति मुट्ठी खोलने की भूल करेगा? सवाल केवल यहीं नहीं है, उन सभी आंखों में हैं जो इस बात को समझते हैं।
क्योंकि बंद मुट्ठी लाख की होती है। खुल गई तो खाक की हो जानी है। समझदार व्यक्ति
मुट्ठी क्यों खोलने लगा। इस दौर में समझदार वही है जिसके सामने सत्ता हाथ बांधे
खड़ी हो। प्रशासन मिलने को लालायित हो और मीडिया तलबगार। हाल फिलहाल तो ऐसा तो एक
ही है इस क्षेत्र में। वो है बी डी अग्रवाल। जमींदारा पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष
बी डी अग्रवाल। राजस्थान में दो सौ सीटों पर चुनाव लड़ने की बात करने वाले बी डी
अग्रवाल। जिनके बारे में कहा जाता है कि बीकानेर संभाग सहित कई अन्य जिलो में इनका
काफी प्रभाव है। प्रभाव की केवल चर्चा है। यह प्रभाव अभी
साबित नहीं हुआ है। चुनाव में बी
डी अग्रवाल के उम्मीदवारों का क्या होगा अभी कुछ नहीं पता। क्योंकि पैसा और नाम ही चुनाव जीतने
की गारंटी होता तो 1993 में भैरो सिंह शेखावत श्रीगंगानगर से विधानसभा का चुनाव
नहीं हारते। ना बिड़ला जी को एक अदने से आदमी के साथ अपने ही क्षेत्र में हार का
मुंह देखना पड़ता। वैसे जब सब कुछ वैसे ही मिल रहा है तो चुनाव की रिस्क किसलिए? चुनाव में कल को बंद मुट्ठी खुल गई तो जो है
वह भी नहीं रहेगा। इसलिए जरूरी नहीं कि बी डी अग्रवाल चुनाव के रास्ते आगे बढ़ें। संभव है चुपचाप सभी को आशीर्वाद
दें और खुद तमाशा देखें जीत हार का। जो जीता
वह उनका। आज तो विधायक,सांसद सहित अनेक जनप्रतिनिधि उनकी हाजिरी में हैं। प्रशासन में भी जो चाहे
करवा सकते हैं। चुनाव में जमींदारा पार्टी का कोई बंदा नहीं
जीता तो फिर ना कोई जनप्रतिनिधि हाजिरी भरेगा ना कोई स्वाभिमानी अधिकारी। आने वाले सरकार की
नाराजगी का डर अलग से। राजनीतिक
विश्लेषक मानते हैं कि इनकी टेंशन लेने से
बेहतर है कि बी डी अग्रवाल “एक सबके लिए,सब एक के लिए’ के वाक्य को
सार्थक कर हर वक्त मौज में रहें। वैसे भी कोई भी बड़ा
कारोबारी सीधे चुनाव के चक्कर में नहीं पड़ता। इसलिए हो सकता है कि बी डी अग्रवाल
भी विधानसभा चुनाव आते आते अपनी पार्टी के उम्मीदवार मैदान में उतारने की बजाए
अंदर खाने कुछ खास व्यक्तियों पर दाव लगाएं। वरना केवल महारथियों के सहारे चुनाव लड़ने
का मतलब तो मुट्ठी को खोलना ही होगा। क्योंकि बी डी अग्रवाल के पास पैदल सैनिक
मतलब कार्यकर्ता तो अभी तक है नहीं जिनके बल बूते पर चुनाव लड़ा जाता है।
Friday, February 8, 2013
कारोबार की तरह धर्म की भी होती है मार्केटिंग
श्रीगंगानगर-जमाना
मार्केटिंग का है। किसी भी कारोबार की मार्केटिंग के बिना कल्पना भी नहीं की
जा सकती। अब तो रिश्तों की भी मार्केटिंग
होने लगी है...वो फलां अधिकारी मेरा ये लगता है.....। जब पग पग पर मार्केटिंग का बोल बाला हो
तो धर्म कैसे पीछे रहे। इसलिए होने लगी है धर्म की मार्केटिंग। इस मार्केटिंग में तो कारोबार से अधिक कंपीटीशन है। श्रीगंगानगर
भाग्यशाली है इस मामले में। यहां झांकी वाले बाला जी का मण्डल इस बात में सबसे आगे है। उनकी इस कला का आज कोई मुक़ाबला करने वाला
नहीं है। धर्म,श्रद्धा,आस्था की ऐसी मार्केटिंग की कि पूरे क्षेत्र में इनकी और इनके बाला जी की बल्ले बल्ले
हो गई। कौन है जो इस मण्डल को नहीं जानता। अपने इसी मार्केटिंग गट्स की वजह से कुछ
समय में ही इनके झांकी वाले बाला जी प्रसिद्ध हो गए और उनसे अधिक प्रसिद्धि हो गई
बाला जी खास भक्तों की। अब देख लो,यह
कला ही है इस मण्डल की कि मदिर के आगामी उत्सव के लिए शहर भर में होर्डिंग, पोस्टर,बैनर लगाए जाएंगे। नगर की कोई मुख्य सड़क शायद ही इन
पोस्टरों,होर्डिंग की झांकी से
महरूम रहे। कितनी राशि इस पर खर्च होगी इनकी परवाह भी इनको नहीं है। क्योंकि पैसा
लाना भी तो मार्केटिंग का एक हिस्सा है। धर्म की मार्केटिंग बढ़िया हो। लुभाने वाली
हो। चमक दमक से परिपूर्ण लच्छेदार हो। सीधे सीधे किसी के धर्म,आस्था,श्रद्धा,विश्वास पर असर
करती हो तो ऐसी मार्कर्टिंग वालों खर्च की फीकर करनी भी नहीं चाहिए। धन आता नहीं
धन की बरसात होती है। यही तो कला है। सामने वाला समझ ही नहीं पाता कि ये हो क्या
रहा है। बस,सिर नीचे किए गिरता
ही चला जाता धर्म की मार्केटिंग करने वालों के पैरों में। इनकी मार्केटिंग का ही
चमत्कार ही है कि इनको कहीं भी होर्डिंग लगाने से कोई मना नहीं कर सकता। चाहे वह
बिजली का खंबा हो या टेलीफोन का। कोई चौराहा हो या कोई गली। ये अपने इस अनोखे हुनर
का जलवा ना दिखाएँ तो फिर क्या फायदा। ये तो दुनिया जानती है कि जो दिखता है वह
बिकता है। धर्म की मार्केटिंग करने की कला हर किसी को नहीं सौंपते बाला जी। इनकी
झोली भरी है तो दूसरों को भी इनके पद चिन्हों पर चल यह कला सीखनी चाहिए। क्योंकि
धर्म कभी समाप्त नहीं हो सकता। शहर बढ़ रहा है कई और मंदिरों का स्कोप भी
है। क्या पता कोई टॉफी वाले बाला जी का मंदिर बनाना पड़ जाए। इस लिए पड़े रहो इनकी
शरण में और सीख लो धर्म की मार्केटिंग। बहुत काम आएगी। बहुत क्या यही काम आएगी। “कचरा” पुस्तक की लाइन हैं...भगवान बनना है तो तौर तरीके भी सीख,उसके दर से कभी कोई खाली नहीं जाता।
Tuesday, February 5, 2013
पुल क्या टूटे रिश्ते ही टूट गए.........
श्रीगंगानगर-मोहन! इससे पहले कि मोहन जवाब देता उसकी लड़की बोली, “आ जाओ चाचा जी।“ “पापा हैं क्या” आने वाले ने पूछा। “क्यों पापा नहीं
होंगे तो अंदर नहीं आएगा क्या”,मोहन ने उसे बुलाते हुए कहा। आवाज
देने वाला चचेरा भाई था। “भाई घर नहीं तो मेरा अंदर क्या काम” चचेरे भाई ने मोहन से कहा। “ताई होती तब”,मोहन बोला। तब तो अंदर आता, ताई से आशीर्वाद लेता, चचेरे भाई ने जवाब दिया। चाहे
इस संवाद को कल्पना समझो या हकीकत परंतु मुश्किल से एक
मिनट का संवाद यह तो बताता ही कि रिश्तों को बनाए रखने
में बुजुर्गों की कितनी बड़ी भूमिका होती है। बेशक
आज की जनरेशन माँ-बाप की अहमियत समझें सा समझें। किन्तु उनका महत्व उन परिवारों से पूछो जहां इन्होने
आपस के खट्टे मीठे रिश्तों में
पुल का काम किया। भाई-बहिनों में टूटते रिश्तों को संवाद के माध्यम से बांधे रखा।
नाराज भाई बहिन किसी ना किसी बहाने इसी पुल से होकर एक दूसरे से मिले। आमने सामने
होंगे तो दूरियाँ भी कम होंगी ही। जब ये पुल टूटते हैं तो रिश्ते भी छूट जाते हैं।
टूट जाते हैं। कितने ही ऐसे परिवार होंगे जहां किसी बुजुर्ग के होने से वहां रौनक
लगी रहती है। सुबह नहीं तो शाम को। एक दिन नहीं तो दूसरे दिन। और कुछ नहीं तो
रविवार को किसी वार त्योहार को। किसी छुट्टी के दिन। मतलब ये कि उनके बहाने बहिन ,भाई,रिश्तेदार का आना हो ही जाता था। कहते हैं कि
वो परिवार भाग्यशाली होता हैं जिनके घर रिश्तेदारों,अपनों का आना जाना
रहता है। बुजुर्ग के बहाने आया
है तो बैठेगा भी उनके पास। घर के मेम्बर भी आएंगे। भाई से भाई मिलेगा....बहिन भावज से
मिलेगी...संवाद कायम रहेगा। मिलना मिलाने का सिलसिला भी लगातार चलेगा। बुजुर्ग
माँ-बाप हैं तो छोटा, बड़ा भाई
अपने भाई के घर जाने से नहीं हिचगेगा। घर के बच्चे भी रिश्तों को समझेंगे। उनसे
पहचान करेंगे। अपनापन बढ़ेगा। घर परिवार के संबंध गहरे होंगे। उनकी गरमाहट बहुत देर
तक रहेगी। अब उन घर परिवारों पर नजर दौड़ाओ जिनके
बुजुर्ग प्रस्थान कर गए। बुजुर्गों ने क्या प्रस्थान किया जैसे घर की रौनक ही चली गई। माँ-बाप
नहीं रहे तो भाई-बहिन का आना भी नियमित नहीं रहा। जो रिश्तेदार बार त्योहार माँ-बाप से
मिलने आते उनका आना भी धीरे धीरे कम होने लगा। होता भी कैसे नहीं, पुल जो नहीं रहे रिश्तों के बीच। सब अकेले के
अकेले। जर्जर पुलों को कोई बचाता भी कब तक! एक
ना एक दिन टूटने ही थे। जिस दिन टूटे उस दिन पुल के साथ साथ भाई बहिनों के रिश्ते बिलकुल टूटे नहीं तो छूट जरूर गए।
Sunday, February 3, 2013
रिश्तों में संवाद टूटता है तो दीवार बनती ही है
श्रीगंगानगर-पचास साल पहले जो रिश्तों की महक पूरे परिवार को सुगंधित कर
गौरव का अनुभव करती थी वह अब गायब हो चुकी है। महक तो गई सो गई संवाद भी अपने साथ
ले गई। संवाद टूट चुके हैं। दीवारें बन चुकी हैं। कुछ देखा और कुछ सुना। सालों
पहले एक कस्बे में तीन भाइयों के तीन मकान एक साथ थे। तीनों भाइयों का भरा पूरा
परिवार। बेटे,बहू,पोते,पोतियाँ....... । भोजन जल्दी कर लिया जाता
था। शाम को भोजन के बाद तीनों भाई एक भाई के यहां एकत्रित होते। सर्दी
होती तो कमरे में गद्दे पर बैठते सब और गर्मी में बाहर चबूतरे पर लकड़ी के पट्टे पर जमती
महफिल। वहीं उनके लड़के भी आ जाते। बच्चे भी आस पास ही उछल कूद करते। चर्चा कुछ खास
होती भी और नहीं भी। लेकिन बैठक जरूर होती थी। तब तक घरों में महिलाएं अपना काम
काज निपटा लिया करती थी। चाहे उनके काम अलग थे।
उनकी सोच भिन्न रही होगी। एक दूसरे की मदद भी ना करते हों। लेकिन उनमें संवाद हमेशा कायम
रहा। मिलना भी नियमित रूप से होता। कुछ छोटी मोटी कोई बात भी किसी से हुई होती तो वह मिलने-मिलाने से मिट जाती।वक्त ने ऐसी करवट बदली की घर घर की तस्वीर भी बदल
गई। मस्त तो अपने अपने घर में सब के सब पहले की तरह ही हैं। किन्तु अब
भाइयों में वैसा मिलना नहीं रहा। मिलना तो बड़ी बात है हजारों हजार परिवार तो ऐसे
हैं जहां भाइयों में राम रमी तक नहीं है। इससे उसको कोई लेना देना नहीं और उसको
इससे। किसी के कुछ भी हो कोई मतलब नहीं। एक दीवार है...एक भाई के उत्सव है लेकिन इस उत्सव की उमंग,जोश,आनंद.....दीवार के उस तरफ भाई के मकान तक नहीं पहुंचता। एक भाई संकट में हो तो दूसरा उसकी परवाह नहीं करता। उसको संकट का दर्द भी शायद ही महसूस होता हो।बहिन का मुंह पूर्व में है तो भाई का पश्चिम
में। जब सगे बहिन भाइयों में ही संवादहीनता की स्थिति है तो उनके बच्चों में कोई
ताल मेल कैसे रह पाएगा? उनके लिए
चाचा,ताऊ,बुआ के रिश्तों के प्रति आदर-मान रहना कैसे संभव है।
अंदर के झूठे,खोखले अहंकार वाले
इस वक्त ने इंसान को सब कुछ रहते हुए भी अकेला कर दिया। उसके मन की
शांति,सुकून,उमंग,उल्लास सब कुछ छीन लिया। ऐसा नहीं है कि उनको इसका दुख ना होता हो, अकेलेपन में अंदर
का सन्नाटा अपनों की याद ना
दिलाता हो। मगर करें क्या....जैसे जैसे समय आगे बढ़ा रिश्तों के बीच की दीवार बड़ी होती
चली गई, उनके कद से भी बड़ी। अब तो उस तरफ झांक भी
नहीं सकते। शर्म भी आती है। झिझक होती है। दौड़ के एक दूसरे को गले लगाने की बात तो करना ही
बेमानी है। सपना है। ख्याल है। भविष्य क्या होगा यह सोचकर ही दिल की धड़कन तेज हो
जाती है।
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