Friday, February 20, 2009

विचार नही स्टार चाहिए

---- चुटकी----

विचार नहीं,खेल
फ़िल्म और टीवी के
बड़े स्टार चाहिए,
सांसद बनना है तो
आप भी हमारे
झंडे के नीचे आइये।

Thursday, February 19, 2009

गीतकार नीरज ने किया विमोचन

राजस्थान प्रशासनिक सेवा के अधिकारी राजेन्द्र कुमार मीणा के प्रथम काव्य संग्रह आबशार-ऐ-अश्क का विमोचन प्रख्यात गीतकार,कवि डॉ० गोपाल दास नीरज ने अलीगढ में किया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि इस पुस्तक की सुगंध राजस्थान में ही नहीं पूरे देश में फैलेगी। श्री नीरज ने कहा कि समाज के विभिन्न क्षेत्रों में आज पतन का दौर चल रहा है। राजनीति और साहित्य दोनों भ्रमित हैं। आज पैसा ही सब कुछ हो गया है। श्री मीणा ने कहा कि श्री नीरज जी के आशीर्वाद से ही मेरी कल्पनाएँ पुस्तक के रूप में आ सकीं हैं। अलीगढ में कवि सम्मलेन भी हुआ। [विडियो में पुस्तक का विमोचन करते हुए श्री नीरज,कवि सम्मलेन में कविता पाठ करते हुए श्री नीरज जी, श्री मीणा जी।]

श्री नीरज जी शब्दों में"श्री राजेन्द्र कुमार मीणा 'राजेन्द्र' की कुछ कवितायें मैंने सुनीं। श्री राजेन्द्र एक प्रशासनिक अधिकारी हैं। आश्चर्य की बात है कि अपनी प्रशासनिक सेवा में अति व्यस्त रहते हुए भी सौन्दर्य और प्रेम की तथा प्रेम पीड़ा की जो कवितायें लिखी हैं वैसी मैंने पहले न तो कभी सुनीं और न कभी किसी पत्रिका में पढ़ी। वे सहज कवि हैं और ऐसा लगता है कि कवितायें उन्होंने नहीं बल्कि उनके भीतर बैठी हुई गहन अनुभूतियों के कारण स्वंय लिख-लिख गईं। वे मैथिल कोकिल विद्यापति के आधुनिक रूप में मुझे सदा ही प्रभावित करते रहेंगें और सदा याद आते रहेंगें। इस आधुनिक विद्यापति को मेरी हार्दिक शुभकामनायें।" यह सब श्री मीणा की पुस्तक में लिखा हुआ है।

आतंकवाद के दो नाम

---- चुटकी---

पाकिस्तान
कहो या
तालिबान,
आतंकवाद हैं
दोनों नाम।

Wednesday, February 18, 2009

ये जो जिंदगी है

दिल्ली के निकट बहादुरगढ़ और रोहतक के बीच एक क़स्बा है सांपला। इस कस्बे या मंडी में यूँ तो हजारों लोग रहते हैं लेकिन जिक्र केवल नत्थू राम बंसल का। इसकी वजह तो है ही। वजह उनकी और उनके परिवार वालों की हिम्मत। सालों पहले नत्थू राम दो तीन दुर्घटनाओं का ऐसा शिकार हुआ कि उसकी कमर के नीचे का हिस्सा एक प्रकार से पत्थर का हो गया। बस, यह आदमी खड़ा और पड़ा रहता है। बिस्तर पर पड़ा रहेगा या बैसाखी लेकर खड़ा रहेगा। पैर मुड़ते नहीं,कमर झुकती नहीं। घर में ऐसे चलता है जैसे कीड़ी। कहीं जाना हो तो सामान ढोने वाले रिक्शा में "लाद" कर ले जाया जाता है। इसके बावजूद इनको ना तो जिंदगी से कोई शिकायत है ना भगवान से। इनका पूरा परिवार है, समाज में रुतबा है। इनकी पत्नी हो या बेटे किसी ने आज तक उनको ये अहसास नही होने दिया कि वे "पत्थर" हो चुके। उनकी एक आवाज से उनके परिवार वाले उनके पास पहुँच जाते है। ऐसे आदमी उन लोगों के लिए प्रेरणा होतें है जो थोड़ा बहुत चला जाने के गम में ज़िन्दगी से हार मान कर बैठ जाते हैं। इनके घर वालों ने इनका इलाज तो बहुत करवाया मगर जब कुछ बात नहीं बनी तो इसी को प्रसाद मान कर स्वीकार कर लिया। इनको इन दो लाइनों के साथ सलाम-- ना मजा मौज उड़ाने में है,ना मजा गम उठाने में है,गर है चैन "मजबूर", तो दिल को समझाने में है।"

इनका जिक्र भी लाजिमी है

दिल्ली से श्रीगंगानगर के लिए चलने वाली इंटरसिटी एक्सप्रेस ट्रेन में ऐसा बहुत कुछ देखने और महसूस करने को मिला जिसका जिक्र करना लाजिमी सा लगा। ट्रेन के डिब्बे में मैले -कुचैले,फटे कपड़े पहने, बदन पर लटकाए कोई लड़का डिब्बे की सफाई करता हुआ कुछ पाने की आस में हाथ फैलाता है। कोई हाथ पर रखता है कोई उसकी और से मुहं फेर लेता है। कई दयालु यात्री उसको खाने को दे देते हैं। पत्थर के दो छोटे टुकड़े बजाकर गाना सुनाते हुए कोई लड़का या लड़की डिब्बे में आकर आपका ध्यान अपनी ओर खींच सकता है। गाने चाहे कानों में रस ना घोले मगर पत्थर के दो टुकड़े बजाने के अंदाज औरआवाज अवश्य आंखों , कानों को अच्छे लगते हैं। कुछ समय बाद आपको चार पाँच साल के लड़का लड़की जिम्नास्टिक करते दिखेंगें। ये सब कुछ ना कुछ करके, या अपनी टूटी फूटी कला का प्रदर्शन करके कुछ पाने के लिए यात्रियों के आगे हाथ फैलाते है। इनको भिखारी नही कहा जा सकता। कई यात्री इनसे सहानुभूति दिखाते हैं कई इनके बारे में अपमान जनक टिप्पणी करते हैं। ये तो साबित है कि ये भिखारी नही हैं। सम्भव है कभी ऐसा हो कि इनमे से कोई किसी फ़िल्म का पात्र नजर आए। क्योंकि भारतीय गरीबी की तो विदेशों में बहुत अधिक मांग है। कुछ भी हो ये बच्चे भिखारियों से तो बेहतर हैं। फ़िर भी ऐसे बच्चों के लिए किसी ना किसी को तो कुछ करना ही चाहिए। कहीं ऐसा ना हो कि इनका जीवन इसी प्रकार इस ट्रेन में ही समाप्त हो जाए।
ट्रेन के शौचालयों में अश्लील वाक्य भी बहुत अधिक मात्र में लिखे हुए थे। लिखने वाले कितनी गन्दी मानसिकता के होंगें यह आसानी से समझा जा सकता है। लेकिन ट्रेन की सफाई के जिम्मेदार अधिकारियों/कर्मचारियों को तो इनको साफ़ कर देना चाहिए।

Friday, February 13, 2009

मान गया पाक

---- चुटकी---

लो जी
मान गया पाक,
मगर उसका
बिगाड़
क्या लेंगें आप।

वेलेंटाइन डे,दूसरों की बहिन बेटियों के साथ

कोई भी आदमी ये तो पसंद करताहै कि वो किसी सुंदर सी लड़की/महिला के साथ इधर उधर मटर गश्ती करे,फ़िल्म देखने जाए, होटल में बतियाए,ऐश मरे। लेकिन ऐसा करने वालों में से कोई ये बर्दाश्त नहीं कर सकता कि कोई उसकी बहिन बेटी के साथ ऐसा करे। मतलब साफ़ है कि इस मामले में सभी के पास दो तराजू होते है। लेने के लिए अलग देने के लिए अलग। यही मानसिकता वेलेंटाइन डे का समर्थन करने वालों की है। वेलेंटाइन डे के हिमायती अगर इसको इतना गरिमामय मानते हैं तो वे अपनी बेटियों और बहिनों को आगे करे। लड़कों को पीले चावल देकर बुलाएँ कि आओ भई मनाओ वेलेंटाइन डे, हाजिर हैं हमारी बहिन बेटियाँ। फ़िर उनको पता लगेगा कि इसका क्या मतलब होता है। जो आजादी तुम दूसरों के लिए मांग रहे हो वह अपनी लड़कियों और बेटियों को क्यों नहीं देते? कौन रोकता है तुमको वेलेंटाइन डे मनाने से मगर शरुआत घर से हो तो लोगों को भी प्रेरणा मिलेगी। कथनी और करनी में अन्तर तो नही होना चाहिए। भारत की गरिमा को कम करने में लगे ये मक्कार लोग वेलेंटाइन डे के बहाने दूसरों की बहिन बेटियों को निशाना बनाते है। मीडिया से जुड़े वो लोग जो ऐसे लोगों को कवर करतें हैं उनसे सीधे शब्दों में पूछे कि क्या उनकी लड़की भी वेलेंटाइन डे मनाने अपने घर से निकली है। या उसको ऐसा करने की इजाजत दी गई है। सच तो ये है कि " जाके पैर न फटी बेवाई,वो क्या जाने पीर पराई" जब वेलेंटाइन डे के समर्थक लोगों की लड़कियां अपने यारों के साथ ऐश करती हुई उनको दिखेगी तब उनको पता चलेगा कि ये क्या है। आज मिडिल क्लास परिवारों में वेलेंटाइन डे को लेकर चिंता रहती है कि पता नहीं कौन क्या कर दे। छोटे शहरों के अभिभावकों को फ़िक्र अधिक रहता है।

Wednesday, February 11, 2009

चड्डी साड़ी में घमासान

---- चुटकी----

वेलेंटाइन डे पर
चड्डी और साड़ी में
हो गया घमासान,
कोई जीते कोई हारे
दाव पर लगी है
नारी की शान।

उधार का आयातित प्रेम दिवस

हमारे महान हिंदुस्तान को पता नहीं क्या हो गया या कुछ सिरफिरे लोगों ने कर दिया कि सड़े गले,दुर्गन्ध वाले विदेशी रीति रिवाजों को अपने अन्दर समाहित करने में अपने आपको गौरवान्वित महसूस करता है। यहाँ बात करेंगें वेलेंटाइन डे की। जिस हिंदुस्तान में सदियों से प्रेम,प्रीत,स्नेह,लाड ,प्यार की नदियाँ बहती रहीं हैं वह यह डे प्रेम सिखाने आ गया। या यूँ कहें कि प्रेम के नाम पर गन्दगी फैलाने आ गया। हिंदुस्तान तो प्रीत का दरिया है। कौनसा ऐसा सम्बन्ध है जो प्रेम पर नहीं टिका हुआ। सोहनी-महिवाल को कोई भूल सका है क्या? राधा -कृष्ण की प्रीत की तो पूजा जाता है। मीरा की भक्ति भी तो प्रेम का ही एक रूप थी। सुदामा-कृष्ण,श्रीराम और बनवासी निषाद राज की मित्रता का प्रेम क्या प्रेम नहीं था। अर्जुन से प्रेम था तभी तो कृष्ण ने उसका सारथी बनना स्वीकार किया। लक्ष्मण-उर्मिला के प्यार को लिखने के लिए तो कोई शब्द ही नहीं है। श्रवण कुमार का अपने माता-पिता के प्रति प्यार तो इतिहास बना हुआ है। श्रीराम और सुग्रीव ने अपनी मित्रता के प्रेम को कैसे निभाया कौन नहीं जानता। भाई के प्रति भाई के प्रेम की कहानी तो रामचरितमानस के पन्ने पन्ने पर है। प्रेम तो वह है जिसका कोई आदि और अंत ही नहीं है।ये नाम तो वो हैं जो आम हिन्दुस्तानी जानता है। इसके अलावा भी ना जाने कितने ही नाम होंगें जो प्यार को अमर बनाकर चले गए। पता नहीं संस्कार वान हिन्दुस्तानियों ने अपने सास्वत सत्य प्रेम को छोड़कर झूठे,क्षणिक वेलेंटाइन मार्का प्यार को क्यों अपनाना शुरू कर दिया जो यह कहता है बस एक दिन प्रेम करो और उसको भी लड़कियों से जोड़ दिया। जबकि हिंदुस्तान में तो हर पल हर क्षण प्रेम, प्यार प्रीत की गंगा बहती है।
पता नहीं यह आयातित प्रेम हमारे लड़के-लड़कियों को कहाँ लेकर जाएगा। एक दिन के प्रेम में शालीनता,गरिमा की तो उम्मीद ही नहीं की जा सकती। जबकि हिन्दुस्तानी प्रेम की तो नीवं ही गरिमा और शालीनता है। किसी ने कहा है--"ये कोई खेल नहीं है जिंदगी के जीने का, लगी है शर्त तो सिक्का उछल कर देखो"।

Tuesday, February 10, 2009

फाल्गुन में सावन की सी रिमझिम

प्रकृति और दिल पर किसी का कोई बस नहीं है। ये दोनों कब क्या कर बैठें कोई नहीं जानता। श्रीगंगानगर में आज ऐसा ही हुआ। सुबह का नजारा प्रकृति का सौन्दर्य अपने अन्दर समेटे हुए था। आसमान में यहाँ से वहां तक काली घनघोर घटायें इस सौन्दर्य में चार चाँद लगाती दिखीं। हलकी बूंदा बांदी शहर को धीरे धीरे भिगोने में लगी हुई थी। आज फाल्गुन मास का पहला दिन था। लेकिन प्रकृति सावन का दृश्य दिखाने को लालायित थी। रात को यह पोस्ट लिखने तक मौसम ऐसा ही बना हुआ था। ठण्ड जो लगभग विदा ले चुकी थी फ़िर से द्वार पर आ खड़ी हुई। भोर से अब तक शहर प्रकृति के इस अनुपम उपहार से भीगता रहा।सूरज ने बादलों की ओट में ही पूर्व से पश्चिम तक का अपना सफर तय किया। आज सूरज की नहीं चली। दिन में भी सांझ का अहसास होता रहा। टाइम ने बताया कि यह शाम का वक्त है। वैसे श्रीगंगानगर की सर्दी और गर्मी दोनों गजब की होती है। सर्दी में न्यूनतम तापमान शून्य के आसपास और गर्मी में अधिकतम तापमान ५० डिग्री सेल्सियस के निकट रहता है। आज लोगों ने प्रकृति का आनंद भी लिया और परेशान होने वाले इस बरसात से परेशान भी हुए। मगर प्रकृति को इस से क्या!

जाते जाते नई शुरुआत

श्रीगंगानगर के निवर्तमान एसपी आलोक विशिस्ट आज जाते जाते यहाँ एक नई शुरुआत कर गए। उन्होंने मीडिया कर्मियों को अनौपचारिक बातचीत के लिए बुलाया। उन्होंने जिस प्रकार से मीडिया को बुलाया था बात भी उसी प्रकार की , बिना लाग लपेट के। वे उस कुर्सी पर नहीं बैठे जो उनके लिए होती है। हालाँकि अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक ने उनसे बार बार अपनी चेयर पर बैठने का आग्रह किया लेकिन वे नहीं माने। उन्होंने साफ कहा कि वे आज केवल अनौपचारिक बात चीत के लिए ही आयें हैं। श्री आलोक जी किसी की आलोचना से बचे, इलाके की जनता की सकारात्मक सोच की सराहना की। इसी बात चीत के दौरान नवनियुक्त एसपी उमेश चन्द्र दत्ता भी आ गये। एक घंटा तक विभिन्न मसलों पर बात चीत हुई। उन्होंने श्रीगंगानगर इलाके को बहुत अच्छा बताया। सभी मीडिया कर्मियों ने उनको गुड लक कहा। श्रीगंगानगर में ऐसा पहली बार हुआ जब निवर्तमान एसपी ने मीडिया कर्मियों को अनोपचारिक बात चीत के लिए बुलाया। कई साल पहले पत्रकार संगठन जाने वाले एसपी को विदाई पार्टी देकर नए एसपी का स्वागत किया करते थे।
नए एसपी उमेश चन्द्र से भी इसी मूड में चर्चा हुई। उनसे पूछा गया कि क्या वे भी जिला कलेक्टर की तरह अपना मोबाइल फोन नम्बर जनता के लिए सार्वजानिक करना चाहेंगे? उन्होंने कहा कि वे पहले यहाँ के सिस्टम को समझ कर फ़िर इस बारे में कोई बात करेंगें। नए एसपी मूल रूप से चंडीगढ़ के रहने वालें हैं।

Monday, February 9, 2009

भिखारिन के जज्बे को सलाम


आदमी थोड़ा देकर बहुत नाम कमाने की भावना दिल और दिमाग में रखता है। बहुत से ऐसे भी हैं जो सौ रुपल्ली का सामान अस्पताल में बाँट कर दो सौ रूपये उसके प्रचार में लगा देते हैं। मगर यह पोस्ट उनको समर्पित नहीं है। यह समर्पित है उस भिखारिन को जिसको भिखारिन कहना ही नही चाहिए। श्रीगंगानगर से प्रकाशित "प्रशांत ज्योति" दैनिक अखबार में एक ख़बर है। ख़बर यह बताती है कि एक भिखारिन ऐसे लोगों के लिए लंगर लगाती है जो असहाय है। इस भिखारिन के जज्बे को सलाम करते हुए यही कहना है कि हमें ऐसे लोगों से कुछ तो प्रेरणा लेनी ही चाहिए। "मजबूर" ने अपनी किताब "डुबकियां" में लिखा है---"कुछ देने से सब कुछ नहीं मिलता मजबूर,सब कुछ देने से कुछ मिलता है जरुर"। वे ये भी कहतें हैं--" हर जिंदगी है मुश्किल,हर जिंदगी है राज, मुझ से हजार होंगें,मुझ सी दास्ताँ नहीं"।

पाक में जिन्ना,भारत में राम जी

---- चुटकी----

पाक में जिन्ना
भारत में
श्रीराम जी,
आडवानी जी का
पता नहीं
कैसे बनेगा काम जी।

Sunday, February 8, 2009

पाक,तालिबान,जेहाद और कसाब

---- चुटकी----

पाक,तालिबान,
जेहाद और कसाब,
इसके सिवा
न्यूज़ चैनलों में
और
क्या है जनाब।

Friday, February 6, 2009

मंदी में महंगा सामान

--- चुटकी----

क्रिकेट खिलाड़ियों के
खूब लगे दाम,
इतनी मंदी में
इतना महंगा
मिला सामान।

--गोविन्द गोयल

धन्यवाद आपका और उनका


सीमा जी, आपका धन्यवाद। धन्यवाद इस बात का कि आपने मुझे इस बात की जानकारी दी कि मेरे ब्लॉग और पोस्ट "मृत शरीर का दान" की चर्चा बैंगलोर से प्रकाशित "दक्षिण भारत" नामक अखबार में हुई है। धन्यवाद अखबार के सम्पादक का भी जिन्होंने मृत देह दान करने वाले परिवार की भावना को समझा और उसे अपने अखबार में स्थान दिया। उम्मीद है कि मेरा विनम्र धन्यवाद अखबार संचालकों तक पहुँच जाएगा।

Thursday, February 5, 2009

मृत शरीर को दान किया

किसी ने कहा है " हट के दिया,हट के किया याद रहता है। हमारे हिंदुस्तान मृत शरीर के प्रति आदर मान का भाव है। डैड बॉडी चाहे किसी भी धर्म से सम्बन्ध रखने वाले इन्सान की हो उसका निरादर नही किया जाता। हम तो बॉर्डर पर रहतें है इसलिए जानते हैं कि बॉर्डर पर जब कोई पाक घुसपैठिया मारा जाता है तो उसकी डैड बॉडी का भी उसके धर्म के अनुरूप अन्तिम संस्कार किया जाता है। यह तो आम बात है। आज जिसके बारे में लिखा जा रहा है वह जरा हट के है। श्रीगंगानगर में एक परिवार में एक महिला की मौत हो गई। मौत ही एक सच्चाई है बाकी सब झूठ है। महिला के परिजनों ने डैड बॉडी का अन्तिम संस्कार नहीं करके उसको मैडिकल कॉलेज को दान कर दिया । मृत महिला के परिजनों ने शव की अन्तिम यात्रा निकली। अर्थी को मरघट तक लेकर गए । वहां उसके अन्तिम दर्शन करके डैड बॉडी को मेडिकल कॉलेज को दान में दे दिया गया। जिस देश में धर्म के प्रति अंध विश्वाश हो। उस देश में अपने परिजन की मृत देह का अन्तिम संस्कार करने की बजाय उसको किसी के हवाले कर देना अपने आप में जरा हट के है। हजारों साल पहले एक महात्मा दाधीच ने भी अपने शरीर को दान कर दिया था। "तन का बंधन दुनियादारी,रूह का मिलना प्यार,डाल झुके तो जीत तुम्हारी,उछल तोड़ना हार।

Wednesday, February 4, 2009

फाल्गुन कैसे गुजरेगा जो नहीं आए भरतार

दरवाजे पर खड़ी खड़ी
सजनी करे विचार
फाल्गुन कैसे गुजरेगा
जो नहीं आए भरतार।
----
फाल्गुन में मादक लगे
जो ठंडी चले बयार
बाट जोहती सजनी के
मन में उमड़े प्यार।
----
साजन का मुख देख लूँ
तो ठंडा हो उन्माद,
"बरसों" हो गए मिले हुए
रह रह आवे याद।
----
प्रेम का ऐसा बाण लगा
रिस रिस आवे घाव
साजन मेरे परदेसी
बिखर गए सब चाव।
----
हार श्रंगार सब छूट गए
मन में रही ना उमंग
दिल पर लगती चोट है
बंद करो ये चंग।
----
परदेसी बन भूल गया
सौतन हो गई माया
पता नहीं कब आयेंगें
जर जर हो गई काया।
----
माया बिना ना काम चले
ना प्रीत बिना संसार
जी करता है उड़ जाऊँ
छोड़ के ये घर बार।
----
बेदर्दी बालम बड़ा
चिठ्ठी ना कोई तार
एस एम एस भी नहीं आया
कैसे निभेगा प्यार।

Tuesday, February 3, 2009

पचास घंटे का अवरोध

श्रीगंगानगर में ५० घंटे बाद इन्टरनेट सेवा बहाल हो सकी। शनिवार की शाम अचानक भारतीय दूर संचार निगम की केबल कटने से बहुत बड़े इलाके में इन्टरनेट ठप्प हो गई। इस से बड़ी संख्या में उपभोग्ता प्रभावित हुए। दो दिन तक साइबर बंद रहे। लेकिन नगर से प्रकाशित होने वाले कई प्रमुख अखबारों में इस बात का कोई जिक्र तक नहीं। जबकि निगम के ऑफिस में इस बारे में शिकायतों का अम्बार लगा हुआ था। सन्डे को ऑफिस बंद था कुछ नही हो सका। सोमवार को ऑफिस खुला तब खराबी को ठीक करने का काम शुरू हुआ जो रात को ओके हो सका। सन्डे को तो निगम की फोन सेवा भी अस्त व्यस्त रही। इन्टरनेट की चाल तो अभी भी नोर्मल नहीं हो पाई है। हाँ इतना जरुर है कि कुछ करने लायक जरुर हो गए। साइबर संचालकों को दो दिन ठाले बैठे रहना पड़ा, पर निगम को क्या फर्क पड़ता है।