Thursday, August 6, 2009
सरकार नींद में,जनता अचेत
सरकार नींद में
जनता अचेत,
सब्जी,दाल,चीनी
हाथ से ऐसे
निकल गई,
जैसे
बंद मुट्ठी से रेत।
Wednesday, August 5, 2009
रिश्तों के झरने बहतें हैं
बंधने का अहसास
ना हो तो उसे
स्नेह,प्यार,प्रीत,ममता
लाड ,दुलार कहते हैं,
ये सब किसी का भी
हो सकता है,
बहिन,मां,भाभी,
पत्नी,प्रेयसी,चाची,ताई
कोई माई,मामी,बुआ का ,
ये हिंदुस्तान है
यहाँ तो
रिश्तों के झरने बहतें हैं।
Tuesday, August 4, 2009
नींव कमजोर,कंगूरे खुबसूरत
Monday, July 27, 2009
प्रेम,लगाव, हिंसा और तोड़फोड़
Thursday, July 23, 2009
घर में घुस गया डर
Tuesday, July 21, 2009
सास,सासरे की आस
सास,
सासरे की
आस।
आज, सबसे पहला फोन इसी आस के सदा के लिए टूट जाने का मिला। हालाँकि उनकी बीमारी को देखते हुए इस दुखद फोन कॉल ने तो आना ही था। इस से भी दुखद और कष्ट दायक था , इस फोन की जानकारी पत्नी को देना। जानकारी देनी ही थी। तुंरत दी भी। पत्नी की मां भी वैसी ही होती है जैसी ख़ुद की। जाना तो सभी ने है। इन्सान चाहे समय की पाबन्दी ना समझे। भगवान के यहाँ तो एक एक पल क्या एक एक साँस का हिसाब है। नारायण नारायण।
Sunday, July 19, 2009
जो चीज सरकारी है, वह चीज हमारी है
चाहे ये बंगले ना छोडें। देश वासी इनको शर्मसार तो कर ही सकते हैं। तो हो जाओ शुरू। आज से और अभी से। सबसे पहले हम ही इनको लानत भेजते हैं। सरकारी बंगले पर कब्जा जमाये रखने वाले किसी पूर्व मंत्री या सांसद का बन्दा इसको पढ़ रहा है तो वह जाकर उनको बताये। हर ब्लोगर जहाँ तक सम्भव हो इनके बारे में लिखे। इनको बार बार चुनाव हारने का श्राप दे। इनके वोटर इनसे नाराज हो जायें। समर्थक इनको गालियाँ निकालें । शुभचिंतक इनके घर आना बंद करदें। मीडिया इनको देखते ही गली बदल ले। इनके घर के आस पास कोई प्रदर्शन भी ना हो। ना इनका लैंड लाइन फोन बजे ना मोबाइल। कोई इनको पी पी कॉल भी ना करे।
मुझे अभी तो इतना ही समझ आ रहा है। ऐसा आप सब लिखो। नई नई बात,नए श्राप।
Monday, July 13, 2009
नए स्टाइल की पत्रकारिता
Sunday, July 12, 2009
विलाप में सम्मान की खुशी
श्रीगंगानगर,हनुमानगढ़ में आजकल बिजली और पानी के लिए त्राहि त्राहि मची हुई है। खेतों में खड़ी फसल बिन पानी के जल रही है। नगरों में बिजली के बिना कारोबार चौपट होने को है। कोई भी ऐसा वर्ग नहीं जो आज त्राहि माम,त्राहि माम ना कर रहा हो। त्राहि माम के इस विलाप को नजर अंदाज कर हमारे सांसद भरत राम मेघवाल अपने स्वागत सत्कार,सम्मान करवाने में व्यस्त हैं। एक एक दिन में गाँव से लेकर नगर तक कई सम्मान समारोह में वे फूल मालाएं पहन कर गदगद होते हैं।सम्मान पाने का अधिकार उनका हो सकता है। किंतु ऐसे वक्त में जब चारों ओर जनता हा हा कार कर रही हो, तब क्या यह सब करना और करवाना उचित है?
सांसद महोदय, प्रोपर्टी और शेयर बाज़ार ने तो पहले ही लोगों की हालत बाद से बदतर कर रखी है। अगर खेती नहीं हुई तो खेती प्रधान इस इलाके में लोगों के पास कुछ नहीं बचेगा।
Friday, July 10, 2009
ईमानदारी और शराफत को चाटें क्या
ईमानदारी और शराफत, ये भारी भरकम शब्द आजकल केवल किताबों की शोभा के लिए ही ठीक हैं। ईमानदारी और शराफत के साथ कोई जी नहीं सकता। कदम कदम पर उसको प्रताड़ना और अभावों का सामना करना पड़ेगा। इनका बोझ ढोने वालों के बच्चे भी उनसे संतुष्ट नहीं होते। ईमानदार और शरीफ लोगों की तारीफ तो सभी करेंगें लेकिन कोई घास नहीं डालता। ईमानदार और शरीफ को कोई ऐसा तमगा भी नहीं मिलता जिसको बेच कर वह एक समय का भोजन कर सके। दुनियादारी टेढी हो गई, आँख टेढी करो,सब आपको सलाम करेंगें। वरना आँख चुरा कर निकल जायेंगें।
लो जी, एक कहानी कहता हूँ। एक निहायत ही ईमानदार और शरीफ आदमी को प्रजा ने राजा बना दिया। जन जन को लगा कि अब राम राज्य होगा। किसी के साथ अन्याय नहीं होगा। राज के कर्मचारी,अफसर जनता की बात सुनेगें। दफ्तरों में उनका आदर मान होगा। पुलिस उनकी सुरक्षा करेगी। कोई जुल्मी होगा तो उसकी ख़बर लेगी। रिश्वत खोरी समाप्त नहीं तो कम से कम जरुर हो जायेगी। परन्तु, हे भगवन! ये क्या हो गया! यहाँ तो सब कुछ उलट-पलट गया। ईमानदार और शरीफ राजा की कोई परवाह ही नही करता। बिना बुलाए कोई कर्मचारी तक उस से मिलने नहीं जाता। राजा के आदेश निर्देश की किसी को कोई चिंता नहीं। अफसर पलट के बताते ही नहीं कि महाराज आपके आदेश निर्देश पर हमने ये किया। लूट का बाजार गर्म हो गया। कई इलाकों में तो जंगल राज के हालत हो गए। किसी की कोई सुनवाई नहीं। पुलिस और प्रशासन के अफसर,कर्मचारी हावी हो गए। जिसको चाहे पकड़ लिया,जिसको चाहे भीड़ के कहने पर अन्दर कर दिया।ख़ुद ही मुकदमा दर्ज कर लेते हैं और ख़ुद ही जाँच करके किसी को जेल भेज देते हैं। राजा को उनके शुभचिंतकों ने बार बार बताया। किंतु स्थिति में बदलाव नही आया। राजा शरीफ और निहायत ईमानदार है। वह किसी अफसर, कर्मचारी को ना तो आँख दिखाता है ना रोब। सालों से खेले खाए अफसर,कर्मचारी ऐसे शरीफ राजा को क्यों भाव देने लगे। उनकी तो मौज बनी है। राजा कुछ कहता नहीं,प्रजा गूंगी है, बोलेगी नहीं। ऐसे में डंडा चल रहा है,माल बन रहा है। उनका तो कुछ बिगड़ना नहीं। पद जाएगा तो राजा का, उनका तो केवल तबादला ही होगा। होता रहेगा,उस से क्या फर्क पड़ेगा। घर तो भर जाएगा।
बताओ,जनता ऐसे राजा का क्या करे? जनता के लिए तो राजा की ईमानदारी और शराफत एक आफत बन कर रह गई। उनकी आशाएं टूट गईं। उम्मीद जाती रही।राम राज्य की कल्पना, कल्पना ही है। राजा की ईमानदारी और शराफत पर उनके दुश्मनों को भी संदेह नहीं,लेकिन इस से काम तो नही चल रहा। राजा ईमानदार और शरीफ रहकर लगाम तो कस सकता है। लगाम का इस्तेमाल ना करने पर तो दुर्घटना होनी ही है
Thursday, July 9, 2009
सबसे बड़ा बोझ
Sunday, July 5, 2009
नशे का थोक व्यापारी
Thursday, July 2, 2009
एक से नो तक
तारीख--७.८.९
मतलब, १,२,३,४,५,६,७,८,और ९ एक साथ। ऐसा दुबारा हमारे जीवन में तो होने वाला नहीं। इसलिए उस दिन कुछ ना कुछ तो अलग से होना ही चाहिए। जिस से इस पल की याद हमारे दिलों में रहे। क्या होना चाहिए? आप भी सोचो हम भी सोचतें हैं। जब इतने सब सोचेंगें तो हर हाल में नया विचार आएगा ही।
Monday, June 29, 2009
Friday, June 26, 2009
तेजाब से जली लड़की की मौत
Thursday, June 25, 2009
यस, कमेंट्स प्लीज़
कोई ये ना समझ ले कि हम गुलामी या आपातकाल के पक्षधर हैं। किंतु यह तो सोचना ही पड़ेगा कि बीमार को कौनसी दवा की जरुरत है। कौन सोचेगा? क्या लोकतंत्र इसी प्रकार से विकृत होता रहेगा? कोमन मैन को हमेशा हमेशा के लिए स्टुपिड ही रखा जाएगा ताकि वह कोई सवाल किसी से ना कर सके। सुनते हैं,पढ़तें हैं कि एक राज धर्म होता है जिसके लिए व्यक्तिगत धर्म की बलि दे दी जाती है। यहाँ तो बस एक ही धर्म है और वह है साम, दाम,दंड,भेद से सत्ता अपने परिवार में रखना। क्या ऐसा तो नहीं कि सालों साल बाद देश में आजादी के लिए एक और आन्दोलन हो।
Tuesday, June 23, 2009
नो कमेन्ट प्लीज़
Monday, June 22, 2009
परिवार के चार लोगों का गला काटा
कोई आदमी इतना भी निर्दयी हो सकता है! छोटी-छोटी मासूम सी बच्चियों का गला काटते हुए उसके हाथ तक नहीं काम्पे,उसका दिल इतना पत्थर था कि उसको बिल्कुल दया नहीं आई। ऐसा क्या अपराध कर दिया उन लड़कियों ने। आज सुबह सबसे पहले यही ख़बर मिली।
इस हत्या काण्ड से किसी की दिनचर्या में कोई असर नहीं पड़ा। सिवाय पुलिस,प्रेस जैसे काम से जुड़े लोगों के। इनके भी असर कहाँ पड़ता है,हाँ भागदौड थोडी अधिक हो जाती है।
Sunday, June 21, 2009
तूफान पर भी नहीं पड़ती नजर
पत्ता भी गिरता,तो,हो जाती थी ख़बर,
अब तो तूफान भी, पास से
निकल जाए, तब भी, पड़ती नहीं नजर।
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ना जाने किस किस की ख़बर
रहती थी, जेब में हमारे,
अब तो, ख़ुद के बारे में भी
ख़ुद को, कुछ पता नहीं होता।
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ये समय का फेर है कोई
या फ़िर, भाग्य का कोई खेल,
जो मिलते थे बाहें पसार कर
होता नहीं कभी, अब, उनसे कोई मेल।
Friday, June 19, 2009
पी,पी,पी और एक और पी

Thursday, June 18, 2009
आपातकालीन स्थिति के लिए
We all carry our mobile phones with names & numbers stored in its memory। But nobody, other than ourselves, knows which of these numbers belong to our closest family or friends। If we were to be involved in an accident or were taken ill, the people attending on us would have our mobile phone but wouldn't know who to call। Yes, there are hundreds of numbers stored ; but which one is the contact person in case of an emergency? Hence this "ICE" (In Case of Emergency) Campaign।
The concept of "ICE" is catching on quickly। It is a method of contact during emergency situations. As cell phones are carried by the majority of the population, all you need to do is store the number of a contact person or persons who should be contacted during emergency under the name "ICE" ( In Case Of Emergency).
The idea was thought up by a paramedic who found that when he went to the scenes of accidents, there were always mobile phones with patients, but they didn't know which number to call। He therefore thought that it would be a good idea if there was a nationally recognized name for this purpose. In an emergency situation, Emergency Service personnel and hospital Staff would be able to quickly contact the right person by simply dialing the number you have stored as "ICE." For more than one contact name, simply enter ICE 1, ICE 2 and ICE 3 etc. A great idea that will make a difference!Let's spread the concept of ICE by storing an ICE number in our mobile phones today!!! !
Please forward this. It won't take too many "forwards" before everybody will know about this. It really could save your life, or put a loved one's mind at rest .
यह पोस्ट मेरे एक शुभचिंतक ने भेजी है। उन्होंने इसे मेल किया ताकि इसको अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाया जा सके। उसी मकसद से पोस्ट यहाँ डाली गई है। इस उम्मीद के साथ कि है कोई इसे आगे और आगे भेजेगा।
Wednesday, June 17, 2009
एक टेंशन तो समाप्त हुई
हमारे मुहं में रोटी का निवाला होता है,आँख टीवी पर,एक हाथ रिमोट पर,दिमाग बाजार के किसी काम या दफ्तर में और कान वो सुन रहे होते हैं जो बीबी,मां या बच्चे कुछ बोल रहे हैं। फ़िर हम कहते हैं कि आजकल भोजन में स्वाद नहीं आता। स्वाद , स्वाद तो जब आएगा जब तुम भोजन करोगे। रिमोट हाथ में लेकर बार बार चैनल बदल रहें हैं। पता नहीं आपके अन्दर का आदमी कौनसा चैनल देखना चाहता है। जीरो से लेकर सौ तक देखा,फ़िर जीरो पर आ गए। उसके बाद वही एक,दो,तीन लगातार सौ तक। इसका कारण है कि हमारा दिमाग टीवी में नहीं कहीं ओर है।
कल एक जैन मुनि श्री प्रशांत कुमार से मिलने का अवसर मिला। उन्होंने एक पुस्तक"सफलता का सूत्र" दी। इस किताब में एक जगह लिखा है-शिक्षित सा दिखने वाला एक युवक दौड़ता हुआ आया और टैक्सी ड्राईवर से बोला-"चलो,जरा जल्दी मुझे ले चलो। " हाथ का बैग उसने टैक्सी में रखा और बैठ गया। ड्राईवर ने टैक्सी स्टार्ट कर पूछा ,साहब कहाँ जाना है?युवक बोला,सवाल कहाँ -वहां का नहीं है,सवाल जल्दी पहुँचने का है। बस हम जल्दी पहुंचना चाहते हैं, लेकिन लक्ष्य तय नहीं किया।
Tuesday, June 16, 2009
श्रीगंगानगर को मिला नया कलेक्टर
Monday, June 15, 2009
पूर्व मंत्री को बिरादरी ने दुत्कारा
राधेश्याम गंगानगर अपने घर हुई इस हार को किस प्रकार लेंगें,फिलहाल कुछ कहना मुश्किल है। सम्भव है वे बीजेपी को अलविदा कहकर अपनी पुरानी पार्टी कांग्रेस में लौट जायें। राधेश्याम कांग्रेस को अपनी मां कहा करते थे। हो सकता है किसी दिन वे प्रेस कांफ्रेंस में यह कहते नजर आयें, सपने में मेरी कांग्रेस मां आई, कहने लगी,बेटा अब लौट आ मेरे पास। इसलिए मैं कांग्रेस में आ गया,मतलब मां के पास लौट आया। वे ये भी कह सकते हैं, माता कुमाता नहीं होती,बेटा कपूत हो सकता है। देखो, आने वाले दिनों में श्रीगंगानगर की राजनीति में नया क्या होता है। क्योंकि कोई ये सोच भी नहीं सकता था की राधेश्याम गंगानगर को अपनी बिरादरी में ही मात खानी पड़ सकती है। बिरादरी के दम पर जिसने हमेशा राजनीति की हो,उसको बिरादरी दुत्कार दे तो कुछ ना कुछ सोचना तो पड़ता ही है। जब राधेश्याम गंगानगर कुछ सोचेंगें तो तब कुछ न कुछ तो नया होगा ही। आख़िर उन्हें यहाँ की राजनीति का राज कपूर ऐसे ही तो नहीं कहा जाता। राज कपूर फिल्मो के शो मेन थे तो राधेश्याम यहाँ की राजनीति के।
Saturday, June 13, 2009
आप नहीं होते तो.......
आप नहीं होते तो
हम,खूब अंगडाई
लेते हैं,इठलाते हैं,
आपके आते ही
छुई-मुई की भांति
अपने आप में
सिमट जाते हैं।
ये क्या है
ऐसा क्यों होता है
हम नहीं जानते,
हाँ,इतना तो है
आप के सिवा
हम किसी को
अपना नहीं मानते।
Friday, June 12, 2009
ज़िन्दगी और मौत के बीच
विडियो में जो बिस्तर पर दिख रहा है, वह है, सुशील कुमार। यह आजकल यहाँ, श्रीगंगानगर होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज में भर्ती है। गर्दन से नीचे का उसका शरीर काम नही करता। उसकी यह हालत कई साल पहले हुई। उसकी गर्दन में कोई तकलीफ थी। उसने देश के जाने माने हॉस्पिटल, आल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस,नई दिल्ली, में अपना इलाज करवाया। लगातार दो दिन दो ओपरेशन किए गए। यह युवक इसी प्रकार बिस्तर पर पड़ा भगवान और डॉक्टर से मौत मांग रहा है। जिस मेडिकल कॉलेज में यह भर्ती है,वहां इससे कोई पैसा नहीं लिया जा रहा। कॉलेज के एमडी घनश्याम शर्राफ ने बताया कि मैनेजमेंट इसके इलाज और भोजन का खर्च तो वहां कर ही रही है,इसके साथ साथ इसके बच्चे को भी संस्थान में फ्री शिक्षा दी जायेगी। समाजसेवा भावी कई नागरिक लाचार सुशील की मदद को आगे आ रहें हैं। आज श्रीराम तलवार,लालचंद,प्रेम तंवर आदि ने हॉस्पिटल जाकर सुशील को आर्थिक सहायता दी। उन्होंने और भी सहायता करने का वादा किया। सुशील का परिवार आर्थिक रूप से बिल्कुल टूट चुका है। आज परिवार पैसे पैसे को मोहताज हो गया। उसको आर्थिक मदद की जरुरत है।
नारदमुनि ने सुशील कुमार की तमाम रिपोर्ट्स एक बड़े डॉक्टर से कंसल्ट की। डॉक्टर ने बताया कि सुशील को जो तकलीफ है,वह गंभीर है। ऐसे में रोगी के बचने के चांस एक-दो प्रतिशत ही होते हैं। एम्स की बजाय कहीं ओर इलाज करवाता तो लाखों रुपये लग जाते। उनका कहना था कि आदमी को फांसी लगाने के बाद जिस हड्डी के टूटने से मौत होती है,वही हड्डी सुशील की टूटी हुई थी। एम्स की रिपोर्ट्स के अनुसार वहां इसी बीमारी का ओपरेशन किया गया। एम्स की रिपोर्ट्स में इस बात का उल्लेख है कि रोगी के हाथ-पाँव पहले ही ठीक से काम नहीं कर रहे थे।
Wednesday, June 10, 2009
प्रेम-प्रसंग में मचा बवाल
मां-बाप का कसूर क्या है
बाप होने का यह मतलब है कि वह सब कुछ खोता ही चला जाए! एक पिता होने कि इतनी बड़ी सजा कि उसको वह दर छोड़ के जाना पड़े जहाँ उसने अपनी पत्नी के साथ अपना परिवार बनाया,घर को उम्मीदों,सपनों से सजाया संवारा। फ़िर बाप भी ऐसा जो किसी बच्चे पर बोझ नहीं। उसकी पेंशन है। वैसे भी वह अपनी पत्नी के साथ अलग ही तो रहता था। क्या विडम्बना है कि आदमी को अपने ही घर से यूँ रुसवा होना पड़ता है। क्या मां-बाप इसलिए पुत्र की कामना करते हैं?
केवल यह उनके घर का मामला है,यह सोचकर हम चुप नहीं रह सकते। क्योंकि यह हमारे समाज का मामला भी तो है। ठीक है हम कुछ कर नहीं सकते ,परन्तु चिंतन मनन तो कर सकते हैं,ताकि ऐसा हमारे घर में ना हो।सम्भव है कसूर मां-बाप का भी हो। हो सकता है उन्होंने संतान को सब कुछ दिया मगर संस्कार देना भूल गए हों।
Tuesday, June 9, 2009
इम्पोर्टेंट ऑफिस रुल
रुल-२-- इफ बॉस इज रोंग, प्लीज सी रुल नंबर फर्स्ट।
ऐसे में कोई क्या कर लेगा। है कि नहीं।
Monday, June 8, 2009
कलेक्टर था तो क्या......
टिप्पणी--- जिला कलेक्टर था तो क्या खास बात थी !
श्रीगंगानगर के जिला कलेक्टर राजीव सिंह ठाकुर एक केन्द्रीय मंत्री के निजी सचिव बन गए। राजस्थान सरकार ने अभी तक नया कलेक्टर नही लगाया है। इस बात को सात दिन हो गए।
Sunday, June 7, 2009
कोई जवाब है क्या
एक बार बरसात में भीगा हुआ मैं घर पहुँचा।
भाई बोला, छाता नहीं ले जा सकता था।
बहिन ने कहा, मुर्ख बरसात के रुकने तक इन्तजार कर लेता।
पापा चिल्लाये, बीमार पड़ गया तो भागना डॉक्टर के पास। सुनता ही नहीं।
मां अपने आँचल से मेरे बाल सुखाते हुए कहने लगी, बेवकूफ बरसात, मेरे बेटे के घर आने तक रुक नहीं सकती थी।
क्यों है कोई जवाब। यह सब मेरे एक शुभचिंतक ने मुझे मेल किया है। उनका दिल से धन्यवाद।
Friday, June 5, 2009
रास्ते का पत्थर, जस्ट फॉर चेंज
अगर तुम समझती हो
मैं रास्ते का पत्थर हूँ,
तो मार दो ठोकर मुझे
पत्थर की ही तरह,
ध्यान रखना तुम्हारे पैर में
कोई चोट ना लग जाए,
कहीं तुम्हारे दिल से
कोई आह ना निकल जाए,
निकली अगर आह तो
इस पत्थर को दुःख होगा,
हट गया रास्ते से तो
दोनों को ही सुख होगा,
फ़िर मैं सड़क के
किनारे पर पड़ा रहूँगा,
इस राह जाने वाले को
कुछ भी नहीं कहूँगा,
बस, मेरा इतना काम
तुम आते जाते जरुर करना,
उसके बाद मेरा फर्ज होगा
दुआ से तुम्हारा दामन भरना।
Thursday, June 4, 2009
राजशाही आने को है हिंदुस्तान में
बचपन में [मेरे बचपन में] मेरे दादा नगरपालिका के मेंबर रहे थे। अगर वे आगे बढ़ते और मैं या परिवार का कोई सदस्य उनका हाथ पकड़ कर आगे बढ़ता तो शायद हम भी इसका हिस्सा बन जाते। ऐसा हो ना सका। ऐसा होता तो यह सब लिखने के कहाँ से आता। तब तो कोई लिखता भी तो बुरा लगता।
खैर! प्रश्न वही कि कितने सांसद परिवार वाद को आगे बढ़ा रहें हैं? अगर किसी को पता हो तो जरुर बताये। जिससे हमारी जानकारी में बढोतरी हो सके।
Tuesday, June 2, 2009
सौ सौ रूपये बस, इतनी मंदी है क्या
चैनल वाले न्यूज़ एंकर ने इस बात का खुलासा नहीं किया कि पत्रकार क्यों भड़के? केवल और केवल सौ रूपये देख कर या रूपये देख कर। वैसे जब चुनाव में खुल्लम खुल्ला रूपये लेकर खबरें छापी और छपवाई गई तो उसके बाद यही तो होना था। सब नेता जानते हैं कि ख़बर तो मालिक ने छापनी है। प्रेस कांफ्रेंस में आने वाले तो बस कर्मचारी हैं। इसलिए जो उनके दे दिया वह उनपर अलग से मेहरबानी ही तो है। इसमे इतना लफड़ा करने की क्या बात है। जिसने लेना है ले जिसने नही लेना ना ले।
कोई शिकायत नहीं तो राम राज्य ही है
कुल्हे से नीचे गिरने को तैयार घीसी हुई जींस,पैरों में हवाई चप्पल या पट्टी वाले स्लीपर। बाल बिखरे हुए। ये वो लडकें हैं जो पैदल या बाइक पर आपको ऐसे स्थानों पर आते जाते दिखाई देंगे जहाँ लड़कियों का अधिक आना जाना होता है। ये लड़के लड़कियों का पीछा करतें हैं,उनको पीछे घूम कर देखते हैं,उन पर कमेंट्स करतें हैं,और किस्म किस्म की आवाज अपनी बाइक ने निकालते हैं। लड़कियों के निकट जाकर मुस्कुरातें हैं। लड़कियों के पास इनकी यह बदतमीजी सहने के अलावा कोई चारा नहीं होता। यह रोज होता है। अभिभावक कहाँ तक उनकी रक्षा करें? सम्भव है कुछ लड़के लड़कियों का आपस में दोस्ती का रिश्ता हो, लेकिन लड़कों की आवारा आंखों का सामना सभी लड़कियों को करना पड़ता है।
कुछ बनने की चाह में लड़कियां किसी ने किसी कोचिंग सेंटर में कुछ पढ़ने जातीं हैं। कोई भी कोचिंग सेंटर ऐसा नहीं होगा जो लड़के लड़कियों को अलग अलग कोचिंग देता हो। लड़कियों को अलग कोचिंग हो तो लड़के नहीं आते। यह कोचिंग सेंटर चलाने वालों की मज़बूरी है। उनके तो बस धन चाहिए। पुलिस ने काफी हाय तौबा के बाद एक अभियान चलाकर कुछ आवारा लड़कों को पकड़ा। उनके माता पिता को थाने बुलाया और उनकी आवारा सम्पति उनको सौंप दी गई। पुलिस चाहती तो ऐसे लड़कों की फोटो अख़बारों में छपवा कर बता सकती थी,सावधान ये हैं आवारा लड़के! मगर पुलिस तो शरीफ है। वह ऐसा क्यों करने लगी। पुलिस अफसरों के परिवारों की लड़कियां तो गाड़ी में आती जाती हैं इसलिए उनकी बला से किसी और की लड़की के साथ कुछ भी हो उनको क्या! लड़कियों के परिजन मान,अपमान के डर,पुलिस के सौ प्रकार के सवाल जवाब,उनके झंझट के भय से कोई शिकायत नहीं करते। जब कोई शिकायत ही नहीं है तो शहर में राम राज्य है। नारायण नारायण।
Sunday, May 31, 2009
एसपी साहब ! आप तो सुरक्षित हैं ना
Saturday, May 30, 2009
राहुल गाँधी हैं सबके सीइओ
Thursday, May 28, 2009
हीरा और लोहे का अन्तर
इसी के संदर्भ में है आज की पोस्ट। जिन परिवारों की लड़कियां प्लस टू में होती हैं। उनके सामने कुछ नई परेशानी आने लगी है। होता यूँ है कि कोई भी कॉलेज वाले स्कूल से जाकर लड़कियों के घर के पते,फ़ोन नम्बर ले आता है। स्कुल वाले भी अपने स्वार्थ के चलते अपने स्कूल की लड़कियों के पते उनको सौंप देतें हैं। उसके बाद घरों में अलग अलग कॉलेज से कोई ना कोई आता रहता है। कभी कोई स्टाफ आएगा कभी फ़ोन और कभी पत्र। यह सब होता है शिक्षा व्यवसाय में गला काट प्रतिस्पर्धा ले कारण। स्कूल वालों को कोई अधिकार नहीं है कि वह लड़कियों के पते,उनके घरों के फोन नम्बर इस प्रकार से सार्वजनिक करें। ये तो सरासर अभिभावकों से धोका है। ऐसे तो ये स्कूल लड़कियों की फोटो भी किसी को सौंपने में देर नहीं लगायेंगें। जबकि स्कूल वालों की जिम्मेदारी तो लड़कियों के प्रति अधिक होनी चाहिए। अगर इस प्रकार से स्कूल, छात्राओं की निजी सूचना हर किसी को देते रहे तो अभिवावक कभी भी मुश्किल में पड़ सकते हैं। आख़िर लड़कियां हीरे की तरह हैं, जिनकी सुरक्षा और देखभाल उसी के अनुरूप होती है।
नारदमुनि ग़लत है क्या? अगर नहीं तो फ़िर करो आप भी हस्ताक्षर।
Wednesday, May 27, 2009
राहुल गाँधी के नाम पत्र
Monday, May 25, 2009
लेफ्ट को कर दिया राइट
वोटरों ने इस बार
लेफ्ट को कर दिया राइट,
ऐसे में ममता का फयूचर
हो गया, कुछ ब्राईट,
पासवान की दुकान
उन्होंने कर दी बंद,
लालू की लालटेन में
कम कर दी लाईट,
मुलायम हो गए
कुछ अधिक सॉफ्ट,
माया को कर दिया
बिल्कुल ही टाईट।
Sunday, May 24, 2009
अधिकारियों का माफिया ग्रुप
काफी लोग कहेंगें कि आपने संपादक और अधिकारियों के नाम क्यों नहीं लिखे? इसका जवाब है , हम भी एक आम आदमी हैं, इसलिए इनसे डरते हैं, डरतें हैं।
Saturday, May 23, 2009
बारूद के ढेर पर श्रीगंगानगर
Monday, May 18, 2009
बैंक के पन्द्रह लाख रूपये लूटे
श्रीगंगानगर में दंगा
Sunday, May 17, 2009
Saturday, May 16, 2009
सच्ची मुच्ची पाँच साल बाद नजर आए
आज प्रार्थना करने का दिन है
आज प्रार्थना का दिन है। कहते हैं कि प्रार्थना में बहुत अधिक शक्ति होती है। प्रार्थना की जरुरत इसलिए है क्योंकि आज यह तय होने वाला है कि अब भारत की जनता को कौन हांकेगा। चूँकि हमने परिवार सहित ईश्वर के सामने प्रार्थना करनी थी इसलिए जल्दी उठ गया। हालाँकि बच्चों , बीबी ने काफी शोर मचाया, सोने दो, हमें क्या पड़ी है,पड़ोसियों के यहाँ से भी खर्राटों की आवाज आ रहा है। सारा देश ही सो रहा है इसलिए तुम भी मुह पर कपड़ा ढक कर सो जाओ। लेकिन हमारे पर तो देशभक्ति के भूत सवार हो गया। इसलिए न सोये न सोने दिया।स्नान करके सब के सब लग गए ईश्वर से प्रार्थना करने। हे! ईश्वर तुम अगर हो तो इतना ध्यान रखना कि हमारा देश वह चलाये जिसको घर चलाना आता हो। अब हमारे हाथ में तो कुछ है नही। हमने तो हमारे हाथ कटवा लिए। अब तो हम यही चाहते हैं कि हमें किसी मुर्ख के हाथों मार ना खानी पड़े। हमने मार तो खानी है लेकिन कोई समझदार मारेगा तो लगेगा कि हमारी शान बन रही है। हे ! ईश्वर कोई ऐसा ना आ जाए जो मारे भी और रोने भी ना दे। रोने से मन हल्का हो जाता है बस, दर्द थोड़े ना जाता है। ईश्वर जी आप तो जानी जान हो, सबका भूत,वर्तमान और भविष्य जानते हो। यह भी निश्चित रूप से जानते होंगें कि वह कौन होगा जो देश को एक बंदी की भांति चलाएगा। जो केवल अपनी गद्दी बचाने के साम,दाम,दंड और भेद सबका इस्तेमाल करना जानता होगा। किंतु उसको यह नहीं पता होगा कि देश और देशवासियों का भला कैसे होता है। खैर,ईश्वर जी जो आपने सोच रखा है उसको बदलने की ताकत तो किसी में नहीं है। लेकिन इतनी प्रार्थना करने का हक़ तो है कि कोई ऐसा हमारी छाती पर बिठाना जो हमें कम से कम तकलीफ दे।
आप जानते हैं कि आज देश भर में वोटों की गिनती होनी है। और कोई काम तो आज,कल,परसों होगा नहीं। यह गिनती तय करेगी कि देश में किसकी सरकार होगी। अरे! मैं भी किसको बताने लगा। आप ही तो करने वाले हैं यह आप की ही तो लीला है। हे! कृपानिधान आपके कलयुगी नारदमुनि और उसके परिवार की प्रार्थना पर समय मिले तो गौर करना। क्योंकि आज आपके यहाँ तो बड़े बड़े नेताओं की भीड़ लगी होगी। इस भीड़ के पीछे देख लेना आपका नारदमुनि कहीं दुबका खड़ा होगा। मन में यही प्रार्थना लिए कि हे नारायण इस देश पर दया करना। इस पर कोई आंच ना आए। इस देश के लोग हमेशा मुस्कुराते रहें, हर हाल में हर वक्त। बाकी आपकी मर्जी। बड़े बड़े लोगों के बीच में पता नहीं मेरी प्रार्थना आप तक पहुँचेगी भी या नहीं। हम तो कहते हैं सब के सब देश वासी आज प्रार्थना करें अपने अपने ईश्वर से।
Friday, May 15, 2009
श्रीगंगानगर का पारा चढा और चढा
Tuesday, May 12, 2009
राजनीति की फ्रैंडली फाइट समाप्त
अब तो सब के सब नेता अभिनेता बन कर एक दूसरे को रिझाने की कोशिश में लगे हैं। एक दूसरे के निकट आने के बहाने तलाश किए जा रहें हैं। प्रेमियों की तरह मिलने और बात करने के अवसर खोजे या खुजवाये जा रहें हैं। मीडिया भी इस काम में इनकी मदद करता दिखता है। पहला दूसरे से दूरी बनाये था, दूसरा तीसरे से । चौथा अकेला चलने के गीत गा रहा था। देखो वोटर का खेल खत्म हो गया। शुरू हो चुका है असली खेल। सत्ता को अपनी रखैल बनने का खेल, अपनी दासी,बांदी बनाने का खेल,कुर्सी को अपने या अपने परिवार में रखने का खेल। इन सबका एक ही नारा होगा, वही नारा जो शायद बचपन में सभी ने कहा या सुना होगा " हमें भी खिलाओ,वरना खेल भी मिटाओ"। सम्भव है कुछ लोग एक बार किसी के साथ सत्ता के खेल में शामिल हो जायें और बाद में अपना बल्ला और गेंद लेकर चलते बनें। खेल चल रहा है, देखना है कौन किसको खिलायेगा। हाँ इस खेल में देश की जनता का कोई रोल नहीं है। इस खेल से सबसे अधिक कोई प्रभावित होगा तो वह जनता ही है,किंतु विडम्बना देखो अब इस खेल में उसकी कोई भागीदारी नही है।
Sunday, May 10, 2009
आशीर्वाद के बाद माँ की भेंट
Saturday, May 9, 2009
फ़िर बेच देंगे अपना जमीर
नेताओं की तकदीर,
जैसे तैसे कुर्सी पाने की
कर रहें हैं तदबीर,
कुर्सी मिल जाए तो
एक बार फ़िर से
बेच देंगे अपना अपना जमीर।
Thursday, May 7, 2009
पप्पू भी नहीं बने, वोट भी नहीं डाला
मगजमारी के बाद मेरे पोलिंग बूथ के पीठासीन अधिकारी इस बात से सहमत हो गए कि आप किसी को वोट न देना चाहो तो न दो,हम रजिस्टर पर यह लिख देंगें कि आपने इन उम्मीदवारों में से किसी भी उम्मीदवार के पक्ष में वोट डालने से इंकार कर दिया। उन्होंने अपने सहयोगी से यह टिप्पणी रजिस्टर पर लिखवाई" इनमे से किसी भी उम्मीदवार को वोट देने से इंकार कर दिया"। उसके बाद उन्होंने मेरे हस्ताक्षर करवाए और अपने ख़ुद के किए।ऐसा केवल मैंने नहीं किया। ऐसे वोटर कई हैं जिन्होंने इस प्रकार से अपनी नापसंदगी जाहिर की। एक बूथ पर तो एक वकील के ऐसा करने पर कई और ऐसा की करने को अपने आप राजी हो गए। बेशक इस प्रकार से उम्मीदवारों को नापसंद करने वालों की संख्या दर्जन भर ही हो, मगर कहीं से शुरुआत तो है। शुरुआत होने के बाद ही कोई बात दूर तक जा पाती है।
बताओ तो ऐसा कौन है ?
Tuesday, May 5, 2009
जवाब कौन देगा ?
Saturday, May 2, 2009
"आर" वाले आगे बाकी मैदान से बाहर
हमारा तो यही कहना है कि जिन नेताओं के नाम में "र"[ आर] नहीं आता वे इस पद के लिए अपना समय ना ख़राब करें। ऐसे नेता किसी दूसरे मंत्रालय के लिए अपने आप को तैयार करें। ऐसे नेताओं को आगे आने दिया जाए जिनके नाम में कहीं ना कहीं "र" [ आर] अक्षर बैठा हुआ है। ये बात आज की नहीं है। १९८३ या १९८४ में मैंने एक लेख लोकल अखबार "सीमा संदेश" में लिखा था। जिसमे आर की बात कही थी। देखो कब तक चलता है ये "र" का चमत्कार। इसको संयोग कहें या टोटका, लेकिन अभी तक तो फिट है। अगर प्रधानमंत्री बनना है तो अपने नाम में कहीं ना कहीं "र"[आर] फिट करना ही पड़ेगा।
Friday, May 1, 2009
सोनिया गाँधी के लिए चार ऐ सी
Wednesday, April 29, 2009
सोनिया--हेमा गर्मी में मत आना
सोनिया-हेमा जी आप इस देश की महान नेता हैं। आप जनता की परेशानियों को दूर करने के बड़े बड़े वादे करती हो। इस लिए आप जनता की शुभचिंतक हो। उम्मीद है आप दोनों जनता की परेशानी को समझते हुए श्रीगंगानगर नहीं आयेंगीं। क्योंकि आपकी सभा दोपहर को है ऐसे में लोगों का क्या हाल होगा। भयंकर गर्मी में किसी को कुछ चक्कर-वक्कर आ गया तो आपका और आपकी पार्टी का नाम बदनाम होगा। इसलिए अच्छा है आप ४५ डिग्री तापमान के चलते श्रीगंगानगर का दौरा रद्द कर दें। चुनाव तो हर साल आतें हैं, फ़िर कभी आ जाना।ठीक है।
Monday, April 27, 2009
जरनैल सिंह को ढेर सारे थैंक्स
Sunday, April 26, 2009
दिल की बात आलू के बहाने
Thursday, April 23, 2009
जंगल में हो रहें हैं चुनाव
शेर ने हिरण को पुचकारा
भेड़िये देख रहें हैं
राजा बनने के ख्वाब,
हे दोस्त, जंगल में
कैसे आया इतना बड़ा बदलाव।
लोमड़ी मेमने को गले लगाती है
बिल्ली चूहे के साथ नजर आती है
सूअर बकरी के साथ
घास खा रहा है जनाब,
हे दोस्त ,जंगल में
कैसे आया इतना बड़ा बदलाव।
सुनो भाई,इन जानवरों में
अब भी वैसा ही मरोड़ है
जो दिख रहा है वह तो
कुर्सी के लिए गठजोड़ है,
नकली है इनका भाई चारा
बस क्षणिक है ये बदलाव
सच तो ये है दोस्त
जंगल में हो रहें हैं चुनाव।
Tuesday, April 21, 2009
किराये पर कार्यकर्त्ता, ऑफिस शुरू
Monday, April 20, 2009
नेता की औलाद है तू
ना हिंदू बनेगा
ना तू
मुसलमान बनेगा,
नेता की औलाद है
तू नेता बनेगा।
ना जन की सुनेगा
ना गण की सुनेगा,
जिस से मिलेगा फायदा
तू उस मन की सुनेगा।
Sunday, April 19, 2009
महंगाई है महंगाई
एक फ़िल्म और थी, गोपी। उसका गाना था....रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलयुग आएगा, हंस चुगेगा दाना तुनका कौव्वा मोती खायेगा। इसी गाने में कहा गया था.....चोर उच्चके नगर सेठ और प्रभु भगत निर्धन होंगें,जिसके हाथ में होगी लाठी भैंस वही ले जाएगा.....
क्या कमाल की बात है कि जो आज हो रहा है वह हमारे गीतकारों ने उसकी कल्पना सालों पहले ही कर ली थी। उक्त गानों के ये बोल हमारे आज के जीवन में पूरी तरह से फिट है। वैसे इन बातों को ऐसे भी कह सकतें हैं कि घोडों को घास नहीं मिलती और गधे गुलाबजामुन खा रहे हैं।
Saturday, April 18, 2009
देख तमाशा जूते का
ऐसा तो नहीं होता था
Thursday, April 16, 2009
सांई बाबा का चमत्कार, रोटी
Wednesday, April 15, 2009
पुलिस ने मचाया ग़दर
Monday, April 13, 2009
खो गया आम आदमी
Saturday, April 11, 2009
धर्मनिरपेक्ष राजनीति की सच्चाई
हिन्दुओं को
जितनी अधिक गालियाँ,
आपकी झोली में
उतनी अधिक तालियाँ,
दूसरों को पुचकारो
करो लाड-प्यार,
आपके गले में होंगे
ढेर सारे
फूलों के हार,
यहाँ जो बात
हमने आपको बताई है,
यह कोई
मजाक नहीं
धर्मनिरपेक्ष भारतीय
राजनीति की सच्चाई है।
Friday, April 10, 2009
जूता फेंका हुआ बवाल
जूता फेंका
हुआ बवाल
सज्जन,टाईटलर गए
अपने घर जी,
इसी को
कहतें हैं डेमोक्रेसी
व्हाट एन
आइडिया सर जी।
Thursday, April 9, 2009
Wednesday, April 8, 2009
सिख समाज ने लड्डू बांटे
भारत के गृह मंत्री पी चिदंबरम पर जूता फेंकने वाले जरनैल सिंह के समर्थन में सिख समाज आगे आने लगा है। श्रीगंगानगर में इस समाज के अनेक व्यक्तियों ने गाँधी चौक पर लड्डू बांटे। "उन्होंने कहा, इस देश में सिखों के लिए इंसाफ ना मुमकिन है। सिख इस देश की अदालतों से भी नाउम्मीद हो गए हैं। ...........जमीर की आवाज पर सिख जो भी फैसला लेंगे विश्व जनमत उसकी अनदेखी नहीं कर पायेगा।" आगामी रणनीति तय करने के लिए सिख समाज की १२ अप्रैल को बैठक होगी। शाम को सोनिया गाँधी,जगदीश टाईटलर, सज्जन कुमार के पुतले जलाये जायेंगें। यहाँ की सिख संगत ने जरनैल सिंह को इक्यावन हजार रूपये का ईनाम देने का ऐलान किया है। इन सबके बीच यह सवाल जरुर जहाँ में आता है कि जरनैल सिंह के स्थान पर कोई गोविन्द,मोहन,राम लाल,लालू राम, छैला मल.........जैसा कोई आम आदमी होता तो क्या गृह मंत्री उसको माफ़ कर देते? चलो माफ़ करना और माफ़ी मांगना तो बडापन है, मगर क्या पुलिस और खुफिया विभाग उसको आधे घंटे में घर जाने देते? ये तो जरनैल सिंह सिख समाज का और पत्रकार था,ऊपर से चुनाव। बात वोटों की हो तो फ़िर क्या कहने।
Tuesday, April 7, 2009
शर्मसार हुई पत्रकारिता,नेता बने जरनैल सिंह
Monday, April 6, 2009
नारदमुनि को वापिस भेजा
धर्मराज ने पूछा--ये राहुल कौन है? नारदमुनि--हिंदुस्तान के युवराज हैं महाराज। धर्मराज--तुम्हारा युवराज तो कमाल का है। उसके पास कार तक नहीं है। नारदमुनि--महाराज हिंदुस्तान में तो लाखों परिवार ऐसे हैं जिनके पास घर बार और रोटी तक नही है। फ़िर राहुल के पास तो सरकार है,उसको कार क्या करनी है। धर्मराज--लोगों के पास घर बार और रोटी नहीं है! ये तो भारत के न्यूज़ चैनल नहीं दिखा रहे। वे तो बार बार यही बता रहें है कि राहुल के पास कर नहीं है। नारदमुनि--महाराज आम आदमी के अभाव,दर्द,प्रताड़ना,उसके साथ होने वाला अन्याय ,जुल्म हिंदुस्तान में कोई ख़बर नहीं मानी जाती है। वहां का मीडिया तो बड़ों के लिए है।
धर्मराज--तो फ़िर.......... नारदमुनि--महाराज क्या क्या पूछोगे,मैं जानता हूँ मैं वहां कैसे रहता हूँ। एक जरा से झूठ की वजह से मुझे पकड़ कर यहाँ लाया गया। हिंदुस्तान में तो केवल और केवल झूठ की चलता है। सच तो इधर उधर झूठ के डर से दुबका रहता है। महाराज आप अपना फैसला सुनाओ। धर्मराज--तुमको आरोप मुक्त किया जाता है। दूत नारदमुनि को वापिस हिंदुस्तान भेज दिया जाए। दरबार में बैठे सभी देवी देवताओं के चेहरों पर मुस्कान दिखाई दी। चित्रगुप्त ने आकर मीडिया को फैसले की जानकारी दी। फ़िर वे शुरू हो गए अपने अपने अंदाज में।

