Thursday, August 6, 2009

सरकार नींद में,जनता अचेत

---- चुटकी-----

सरकार नींद में
जनता अचेत,
सब्जी,दाल,चीनी
हाथ से ऐसे
निकल गई,
जैसे
बंद मुट्ठी से रेत।

Wednesday, August 5, 2009

रिश्तों के झरने बहतें हैं

बंधन में बंधने के बावजूद
बंधने का अहसास
ना हो तो उसे
स्नेह,प्यार,प्रीत,ममता
लाड ,दुलार कहते हैं,
ये सब किसी का भी
हो सकता है,
बहिन,मां,भाभी,
पत्नी,प्रेयसी,चाची,ताई
कोई माई,मामी,बुआ का ,
ये हिंदुस्तान है
यहाँ तो
रिश्तों के झरने बहतें हैं।

Tuesday, August 4, 2009

नींव कमजोर,कंगूरे खुबसूरत

आज अचानक एक गौशाला के निर्माणाधीन भव्य गेट पर निगाह थम गई। कई फुट ऊँचे उस गेट पर हजारों हजार रूपये लगेंगे। पता नहीं उस पर किस किस प्रकार की सजावट कर उसके दर्शनीय बनाया जाएगा। उसके पत्थर पर उनका नाम खुदेगा,जो धन देंगे। ताकि समाज में उनका रुतबा हो,नाम हो,लोग उनको धर्म प्रेमी,गोसेवक के रूप में जने,माने,उनका आदर करें। गौशाला प्रबंध समिति के पास करोडों की नहीं तो लाखों रुपयों की एफडी भी होगी। ऐसे ही शानदार आपको धर्मस्थल नजर आयेंगें। एक से एक देखने लायक। कीमती से कीमती सामान उस मन्दिर की शोभा बढ़ा रहा होता है। घर में पानी का गिलास ना लेने वाले लोग-लुगाई वहां सेवा करते दिखेंगें। सब कुछ होगा फ़िर भी भिखारियों की तरह भगवान से और मांगेगें। पता नहीं इनकी कामनाओं का अनत कब होगा? हम कहतें हैं ना हो इनकी कामनाओं का अंत। भगवान और दे इनको और देता ही रहे। इसके साथ थोड़ा सा दिमाग इनका जरुर बदल दे। ताकि ये जो कुछ गौशालाओं और धर्मस्थलों पर खर्च करतें हैं उसका कुछ अंश विद्या के मंदिरों पर भी खर्च करनेलग जायें। क्योंकि प्राइवेट स्कूल तो एक दुकान की तरह चलते हैं, इसलिए वहां तो सब सुविधा मालिक जुटाता है।लेकिन सरकारी स्कूल ऐसे नहीं होते। वहां स्टाफ तो ट्रेंड होता है मगर वह सब नहीं होता जिसकी जरुरत होती है। अब आप को ले चलते हैं एक सरकारी स्कूल के निकट। स्कूल का भव्य गेट तो क्या होना था, जो है उसका दरवाजा ऐसा कि कोई लात मार के तोड़ दे। स्कूल में सुविधा के नाम पर दुविधा ही दुविधा। सरकार ने वोट बैंक बढ़ाने के लिए मास्टर/मास्टरनी तो रख लीं, लेकिन स्कूल गौशाला जैसा भी नहीं है। समस्त काम सरकार नहीं कर सकती। नगर नगर में गौशालाएं सरकार तो नहीं बनवाती। यह सब नगर के वे लोग करते हैं जिनके पास धन और उसको समाज सेवा में लगाने का जज्बा होता है। क्या ही अच्छा हो कि गौशालाएं और धर्मस्थल बनाने वाले लोग स्कूलों पर भी ध्यान दे। इसके लिए सरकार को भी बहुत कुछ करना होगा। हर कोई अपने नाम और ख्याति के लिए धन लगाता है,समय देता है। सरकार ऐसे लोगों को खास तव्वजो दे जिस से ये लोग भारत के उस भवन कोशानदार,जानदार बनायें जहाँ नींव बने जाती है।

Monday, July 27, 2009

प्रेम,लगाव, हिंसा और तोड़फोड़

हिन्दूस्तान के लोगों में प्रेम,स्नेह,लगाव,आस्था,श्रद्धा प्रकट करने का तरीका बहुत ही अलग है। हम प्राणी मात्र के प्रति अपने लगाव का प्रदर्शन भी इस प्रकार से करते हैं कि उसकी चर्चा कई दिनों तक रहती है। हमारे इस प्रदर्शन से किसको कितना दर्द, तकलीफ पहुंचती है,उससे हमें कोई लेना देना नही है। गत दिवस हमरे निकट एक कस्बे में चार सांड और दो बच्छियों की संदिग्ध मौत हो गई। वहां के थानेदार ने यह कह दिया कि यह तो रोड एक्सीडेंट से हुआ। बस, फ़िर क्या था। कस्बे में हंगामा हो गया। हिंसा, तोड़फोड़,पत्थर बाजी हुई। सरकारी बस को आग लगा दी गई। रेल गाड़ी को रोका गया। तोड़ फोड़ की गई। कई घंटे अराजकता रही। अब जिले के कई स्थानों पर गो भक्तों का आन्दोलन शुरू हो रहा है। कोई गिरफ्तारी देने की बात कर रहा है तो कोई बाज़ार बंद करवाने की। ठीक है, आस्था और श्रद्धा की बात है। मगर यह आस्था और श्रद्धा उन सांडों और गायों के प्रति क्यूँ नहीं दिखाई जाती जो गलियों में गन्दगी खाती घूमती हैं। ये धार्मिक लोग तब कहाँ चले जाते हैं जब लोग गलियों में इनपर लाठियाँ बरसाते हैं। ये प्रश्न इन लोगों से पूछा ही जाना चाहिए कि इतनी गोशालाएं, जिनके पास करोडों रुपयों की एफडी होती हैं, होने के बावजूद गायें,गोधे लावारिस क्यों घूमते हैं। इतने हमदर्द होने के बावजूद इनका दर्द क्यों नहीं दूर किया जाता? जब ये जिन्दा होते हैं तब तो गंदगी खाकर अपना जीवन बितातें हैं और जब किसी हादसे का शिकार हो जाते हैं तब इनके लिए हिंसा की जाती है। यह तो वैसा ही है जैसे हम बुजुर्ग माता पिता को दवा के अभाव में मरने देते हैं,मौत के बाद समाज को दिखाने के लिए हजारों हजार रूपये खर्च करते हैं उनके ही नाम पर। ये कैसा चरित्र है हमारा? बाहर से कुछ और अन्दर से और। इसमे कोई शक नहीं कि हम प्राणी मात्र के प्रति प्रेम करते हैं, किंतु यह प्रेम उनके मरने के बाद ही क्यूँ बाहर आता है?वह प्रेम किस काम का जिसके कारण सरकारी सम्पति बरबाद हो जाए,लोग तंग परेशान हों।

Thursday, July 23, 2009

घर में घुस गया डर

कई दिनों से हमारे घर के एक कमरे में घुसते ही मैं डर जाता हूँ। ऐसे लगता है जैसे न्यूज़ चैनल्स के अन्दर बैठे विभिन्न प्रकार के पंडित,ज्ञानी,ध्यानी,ज्योतिषी बाहर निकल कर हमें बुरी नजर से बचाने के लिए नए नए अनुष्ठान शुरू करवा देंगे। एक दो आदर्शवादी चैनल को छोड़ कर, हर कोई इन बाबाओं के माध्यम से धर्म में आस्था रखने वाले लोगों को डराने में लगा हुआ था। घर में जितने सदस्य उतनी राशियां। उनके अनुसार या तो किसी के लिए भी ग्रहण मंगलकारी नहीं और किसी की गणना के अनुसार सभी की पो बारह। अब जिसके लिए ग्रहण मंगलकारी नहीं उसका दिन तो हो गया ख़राब। वह तो उपाए के चक्कर में कई सौ रुपयों पर पानी फेर देगा। जिसके लिए ग्रहण चमत्कारी फायदा देने वाला है, वह कोई काम क्यूँ करने लगा। दोनों ही गए काम से। ना तो बाबाओं का कुछ कुछ बिगड़ा ना न्यूज़ चैनल के संचालकों का। हिन्दूस्तान में ग्रहण पहली बार लगा है क्या? सुना है हिन्दूस्तान तो पुरातन है। यहाँ तो सदियों से ग्रह -नक्षत्रों की खोज,उनके बारे में गहरी से गहरी बात जानने,समझने का काम चलता रहता है। घर के बड़े बुजुर्ग जानते हैं कि ग्रहण के समय क्या करना चाहिए और क्या नहीं। उनको यह सीख न्यूज़ चैनल देख कर नहीं मिली। यह तो हमारे संस्कार हैं। पता नहीं ग्रहण के पीछे लग कर न्यूज़ चैनल वाले क्या संदेश देना चाहते हैं। इसमे कोई शक नहीं कि लोगों में उत्सुकता होती है हर बात को जानने की, उसको निकट से देखने की। किंतु इसका ये मतलब तो नहीं कि उसकी ज्ञान वृद्धि में सहायक होने वाली जिज्ञासा को डर में बदल दिया जाए,उसकी उत्सुकता को आशंका ग्रहण लगा दें। हम तो इतने ज्ञानी नहीं, मगर जो हैं वे तो जानते हैं कि मीडिया का काम लोगों का ज्ञान बढ़ाना,उनको सूचना देना,घटनाओं से अवगत करवाने के साथ साथ उनको जागरूक करना है। यहाँ तो आजकल कुछ और ही हो रहा है। ज्योतिषी,वास्तु एक्सपर्ट,बाबा अपनी दुकान इन न्यूज़ चैनल के माध्यम से चलाते है। जो इनके संपर्क में आते हैं उनका तो मालूम नहीं, हाँ ये जरुर फल फूल रहें हैं। ग्रहण ने सभी खबरों में ग्रहण लगा दिया। देश के कितने हिस्सों में लोग किस प्रकार जी रहें हैं?उनकी जिंदगी पर लगा महंगाई का ग्रहण ना तो उनको जीने दे रहा है ना मरने। कितने ही बड़े इलाके में पानी ना होने के कारण खेती संकट में पड़ी है। खेती नहीं हुई तो इन इलाकों की अर्थ व्यवस्था चौपट हो सकती है। उसके बाद वहां होगा अराजकता का राज। भूखे लोग क्या करेंगें? सरकार अपने अधिकारियों ,मंत्रियों,सांसदों,विधायकों का पेट और घर भरेगी या इनका? खैर फिलहाल तो आप और हम ग्रहण और उसका असर देखेंगें। आख़िर ऐसा ग्रहण हमको इस जिंदगी में दुबारा तो देखने को मिलने से रहा।

Tuesday, July 21, 2009

सास,सासरे की आस


सास,
सासरे की
आस।

आज, सबसे पहला फोन इसी आस के सदा के लिए टूट जाने का मिला। हालाँकि उनकी बीमारी को देखते हुए इस दुखद फोन कॉल ने तो आना ही था। इस से भी दुखद और कष्ट दायक था , इस फोन की जानकारी पत्नी को देना। जानकारी देनी ही थी। तुंरत दी भी। पत्नी की मां भी वैसी ही होती है जैसी ख़ुद की। जाना तो सभी ने है। इन्सान चाहे समय की पाबन्दी ना समझे। भगवान के यहाँ तो एक एक पल क्या एक एक साँस का हिसाब है। नारायण नारायण।

Sunday, July 19, 2009

जो चीज सरकारी है, वह चीज हमारी है

" जो चीज सरकारी है,वह चीज हमारी है। " यह जुमला हिन्दूस्तान के जन- जन में जाना पहचाना है। इस पर आम जन अमल करे ना करे लेकिन हमारे नेता जब भी मौका मिलता इसको सार्थक जरुर करते हैं। अब देखो, हिन्दूस्तान के ऐसे ३६ पूर्व केंद्रीय मंत्री,सांसद हैं, जो लोक सभा का चुनाव हार गए। लेकिन उन्होंने सरकारी बंगले खाली नहीं किए। सब के सब ऐसे हैं जो जब चाहे जहाँ चाहे कोई दूसरा बंगला खरीद सकते हैं। किंतु जो चीज मुफ्त में मिल रही हो उस पर पैसा टका खर्च क्यों किया जाए। इसलिए बैठे हैं। चुनाव कोई कुम्भ का मेला तो है नहीं जिसको आने में १४ साल लगेंगें। यहाँ तो चुनाव ही चुनाव है। कभी आम चुनाव,कभी उप चुनाव। जीतकर फ़िर से बंगला लेने के हक़दार हो जायेंगें। अब कौन बार बार बदला सदली करे।
चाहे ये बंगले ना छोडें। देश वासी इनको शर्मसार तो कर ही सकते हैं। तो हो जाओ शुरू। आज से और अभी से। सबसे पहले हम ही इनको लानत भेजते हैं। सरकारी बंगले पर कब्जा जमाये रखने वाले किसी पूर्व मंत्री या सांसद का बन्दा इसको पढ़ रहा है तो वह जाकर उनको बताये। हर ब्लोगर जहाँ तक सम्भव हो इनके बारे में लिखे। इनको बार बार चुनाव हारने का श्राप दे। इनके वोटर इनसे नाराज हो जायें। समर्थक इनको गालियाँ निकालें । शुभचिंतक इनके घर आना बंद करदें। मीडिया इनको देखते ही गली बदल ले। इनके घर के आस पास कोई प्रदर्शन भी ना हो। ना इनका लैंड लाइन फोन बजे ना मोबाइल। कोई इनको पी पी कॉल भी ना करे।
मुझे अभी तो इतना ही समझ आ रहा है। ऐसा आप सब लिखो। नई नई बात,नए श्राप।

Monday, July 13, 2009

नए स्टाइल की पत्रकारिता

देश-विदेश के किसी और स्थान का तो मालूम नहीं लेकिन श्रीगंगानगर में पत्रकारिता का नया स्टाइल शुरू हो चुका है। स्टाइल अच्छा है या बुरा,सही है या ग़लत,गरिमा युक्त है या नहीं,इस बारे में टिप्पणी करने के लिए यह नहीं लिखा जा रहा। जब कहीं किसी नगर या महानगर में कोई फैशन आरम्भ होता है तो उसकी जानकारी दुनिया में पहुँच जाती है, पहुंचाई जाती है। बस, इसी मकसद से यह पोस्ट है। अरे नहीं भाई, हम पत्रकारिता को फैशन के समकक्ष नहीं रख रहे। हम तो केवल बता रहें हैं कि हमारे नगर में क्या हो रहा है। हम इस बात पर गर्व करते हैं कि हमारे शहर में एक दर्जन अखबार निकलते हैं,पूरी शानो-शौकत के साथ। इसके साथ अब स्कूल,कॉलेज,हॉस्पिटल जैसे कारोबार से जुड़े लोगों ने भी अपने अपने साप्ताहिक,पाक्षिक,मासिक अख़बार निकालने शुरू कर दिए हैं। इन अख़बारों में अपने संस्थान की उपलब्धियों का जिक्र इन मालिकों द्वारा किया जाता है। मतलब अपने कारोबार के प्रचार का आसन तरीका। स्कूल वाले अपने स्कूल के बच्चों की पब्लिसिटी करेंगें। हॉस्पिटल संचालक डॉक्टर द्वारा किए इलाज की। बीजवाला अपने खेत या प्लांट में तैयार किए गए बीज के बारे में बतायेंगें। जिन के पास अख़बार को संभालने वाले व्यक्ति होते हैं वे अपने स्तर पर इसको तैयार करवाते हैं। अन्य किसी पत्रकार की पार्ट टाइम सेवा ले लेता है। हालाँकि इन अख़बारों को अन्य अख़बारों की भांति बेचा नहीं जाता। ये सम्भव है कि स्कूल संचालक अख़बार की कीमत,टोकन मनी, फीस के साथ ले लेते हों। ये अखबार बिक्री के लिए होते ही नहीं। हाँ, स्कूल का अखबार जब बच्चे के साथ घर आएगा तो अभिभावक उसको देखेंगें ही। बच्चे की फोटो होगी तो उसको अन्य को भी दिखाएंगें,बतायेंगें। अब,जब अखबार है तो उसके लिए वही सब ओपचारिकता पूरी करनी होती हैं जो बाकी अख़बार वाले करते हैं। जब,सब ओपचारिकता पूरी करनी हैं तो फ़िर वह कारोबारी अपनी महंगी,सस्ती कार पर भी प्रेस लिखने का "अधिकारी" तो हो ही गया। बेशक इस प्रेस का दुरूपयोग ना होता हो, लेकिन प्रेस तो प्रेस है भाई। श्रीगंगानगर में यह स्टाइल उसी प्रकार बढ़ रहा है जैसे शिक्षा और चिकत्सा का कारोबार।

Sunday, July 12, 2009

विलाप में सम्मान की खुशी

पड़ौस में गम हो तो खुशी छिपानी पड़ती है। स्कूल में कोई हादसा हो जाए तो बच्चों की मासूमियत पर ब्रेक लग जाता है। गाँव में शोक हो तो घरों में चूल्हे नहीं जलते। नगर में बड़ी आपदा आ जाए तो सन्नाटा दिखेगा। यह सब किसी के डर,दवाब या दिखावे के लिए नहीं होता। यह हमारे संस्कार और परम्परा है। समस्त संसार हमारा ही कुटुम्ब है, हम तो इस अवधारणा को मानने वाले हैं। इसलिए यहाँ सबके दुःख सुख सांझे हैं। परन्तु सत्ता हाथ में आते ही कुछ लोग इस अवधारणा को ठोकर मार देते हैं। अपने आप को इश्वर के समकक्ष मान कर व्यवहार करने लगते हैं।
श्रीगंगानगर,हनुमानगढ़ में आजकल बिजली और पानी के लिए त्राहि त्राहि मची हुई है। खेतों में खड़ी फसल बिन पानी के जल रही है। नगरों में बिजली के बिना कारोबार चौपट होने को है। कोई भी ऐसा वर्ग नहीं जो आज त्राहि माम,त्राहि माम ना कर रहा हो। त्राहि माम के इस विलाप को नजर अंदाज कर हमारे सांसद भरत राम मेघवाल अपने स्वागत सत्कार,सम्मान करवाने में व्यस्त हैं। एक एक दिन में गाँव से लेकर नगर तक कई सम्मान समारोह में वे फूल मालाएं पहन कर गदगद होते हैं।सम्मान पाने का अधिकार उनका हो सकता है। किंतु ऐसे वक्त में जब चारों ओर जनता हा हा कार कर रही हो, तब क्या यह सब करना और करवाना उचित है?
सांसद महोदय, प्रोपर्टी और शेयर बाज़ार ने तो पहले ही लोगों की हालत बाद से बदतर कर रखी है। अगर खेती नहीं हुई तो खेती प्रधान इस इलाके में लोगों के पास कुछ नहीं बचेगा।

Friday, July 10, 2009

ईमानदारी और शराफत को चाटें क्या

ईमानदारी और शराफत, ये भारी भरकम शब्द आजकल केवल किताबों की शोभा के लिए ही ठीक हैं। ईमानदारी और शराफत के साथ कोई जी नहीं सकता। कदम कदम पर उसको प्रताड़ना और अभावों का सामना करना पड़ेगा। इनका बोझ ढोने वालों के बच्चे भी उनसे संतुष्ट नहीं होते। ईमानदार और शरीफ लोगों की तारीफ तो सभी करेंगें लेकिन कोई घास नहीं डालता। ईमानदार और शरीफ को कोई ऐसा तमगा भी नहीं मिलता जिसको बेच कर वह एक समय का भोजन कर सके। दुनियादारी टेढी हो गई, आँख टेढी करो,सब आपको सलाम करेंगें। वरना आँख चुरा कर निकल जायेंगें।

लो जी, एक कहानी कहता हूँ। एक निहायत ही ईमानदार और शरीफ आदमी को प्रजा ने राजा बना दिया। जन जन को लगा कि अब राम राज्य होगा। किसी के साथ अन्याय नहीं होगा। राज के कर्मचारी,अफसर जनता की बात सुनेगें। दफ्तरों में उनका आदर मान होगा। पुलिस उनकी सुरक्षा करेगी। कोई जुल्मी होगा तो उसकी ख़बर लेगी। रिश्वत खोरी समाप्त नहीं तो कम से कम जरुर हो जायेगी। परन्तु, हे भगवन! ये क्या हो गया! यहाँ तो सब कुछ उलट-पलट गया। ईमानदार और शरीफ राजा की कोई परवाह ही नही करता। बिना बुलाए कोई कर्मचारी तक उस से मिलने नहीं जाता। राजा के आदेश निर्देश की किसी को कोई चिंता नहीं। अफसर पलट के बताते ही नहीं कि महाराज आपके आदेश निर्देश पर हमने ये किया। लूट का बाजार गर्म हो गया। कई इलाकों में तो जंगल राज के हालत हो गए। किसी की कोई सुनवाई नहीं। पुलिस और प्रशासन के अफसर,कर्मचारी हावी हो गए। जिसको चाहे पकड़ लिया,जिसको चाहे भीड़ के कहने पर अन्दर कर दिया।ख़ुद ही मुकदमा दर्ज कर लेते हैं और ख़ुद ही जाँच करके किसी को जेल भेज देते हैं। राजा को उनके शुभचिंतकों ने बार बार बताया। किंतु स्थिति में बदलाव नही आया। राजा शरीफ और निहायत ईमानदार है। वह किसी अफसर, कर्मचारी को ना तो आँख दिखाता है ना रोब। सालों से खेले खाए अफसर,कर्मचारी ऐसे शरीफ राजा को क्यों भाव देने लगे। उनकी तो मौज बनी है। राजा कुछ कहता नहीं,प्रजा गूंगी है, बोलेगी नहीं। ऐसे में डंडा चल रहा है,माल बन रहा है। उनका तो कुछ बिगड़ना नहीं। पद जाएगा तो राजा का, उनका तो केवल तबादला ही होगा। होता रहेगा,उस से क्या फर्क पड़ेगा। घर तो भर जाएगा।

बताओ,जनता ऐसे राजा का क्या करे? जनता के लिए तो राजा की ईमानदारी और शराफत एक आफत बन कर रह गई। उनकी आशाएं टूट गईं। उम्मीद जाती रही।राम राज्य की कल्पना, कल्पना ही है। राजा की ईमानदारी और शराफत पर उनके दुश्मनों को भी संदेह नहीं,लेकिन इस से काम तो नही चल रहा। राजा ईमानदार और शरीफ रहकर लगाम तो कस सकता है। लगाम का इस्तेमाल ना करने पर तो दुर्घटना होनी ही है

Thursday, July 9, 2009

सबसे बड़ा बोझ

श्रीगंगानगर से कुछ किलोमीटर दूर एक गाँव के एक मकान के बाहर हर वर्ग के लोगों की भीड़, इसके बावजूद वहां सन्नाटा पसरा हुआ था। लोग बोलते भी थे तो एक दूसरे के कान में। खामोशी और सन्नाटे को, या तो आस पास के पेड़ों,मुंडेरों पर बैठे,आते जाते,उड़ते पक्षियों की चहचाहट तोड़ती या फ़िर चर्र,चूं। यह चर्र,चूं उन लोहे की पाइप की थी जिन पर चाँदनी बंधी थे,धूप से बचाव के लिए। हवा के झोंके से पाइप हिलती तो वह चर्र ,चूं बोलकर सन्नाटे तो तोड़ देती।हवा में उल्लास नहीं था। बस, उसके होने का पता लग रहा था। कभी कभी किसी के मोबाइल फोन की घंटी भी खामोशी को भंग कर देती थी। घर के बच्चों पर इस माहौल का कोई असर देखने में नहीं आया। मौत के नाम से अंजान बच्चे अपनी मस्ती में मस्त होकर खेल रहे थे,उनकी मासूम खिलखिलाहट इस बात की गवाही दे रही थी कि सचमुच बचपन हर गम से बेगाना होता है। बचपन को क्या मालूम कि आज सवेरे सवेरे उनके घर में इतने सारे लोग चुपचाप सर झुकाए क्यों बैठें हैं? बर्फ पर रखी जवान लाश का अर्थ इस बचपन को क्या मालूम! इसका मतलब तो वह जाने जिसने अपना बेटा खोया या वह औरत जिसने अपना पति। शोले फ़िल्म में ऐ के हंगल का एक डायलोग है-सबसे बड़ा बोझ होता है, बाप के कंधे पर बेटे का जनाजा। यही बोझ हमारे परिचित को उठाना पड़ा।जवान बेटे की मौत के गम में जब करतार सिंह बराड़ को बिलखते देखा तो पत्थर दिल की आँखे भी नम हो गई। ऐसे गमजदा माहौल में किसको किस प्रकार, किन शब्दों में सांत्वना दी जाए! बेशक देश में इस से भी अधिक दर्दनाक मौत हर रोज होती है, लेकिन मन उसी के लिए दुखता है जिस से किसी भी प्रकार का परिचय हो। असल में तो दुःख,शोक,गम,खुशी ही परिचय पर है। जिसको जानते हैं उसी के सुख-दुःख हमें अपने लगाते हैं। करतार सिंह बराड़ से आपका परिचय नहीं, मगर यहाँ ये जरुर कहना चाहूँगा कि जिसका भी हाथ इन्होने पकड़ा,उसको ख़ुद नहीं छोड़ा। बेटे का हाथ इनके हाथ से कैसे छूट गया ये सर्वशक्ति मान भगवन के अलावा कौन जान सकता है। क्योंकि होना तो वही है जो वह चाहता है। इन्सान तो केवल प्लान बनता है। कब, क्या, कैसे,कहाँ,किसके साथ क्या कुछ होगा वही जानता है।

Sunday, July 5, 2009

नशे का थोक व्यापारी

पुलिस के साथ जो आदमी आपको दिखाई दे रहा है वह है जगदीश प्रसाद। इसके घर से पुलिस ने नशे के ४६००० कप्सूल और ७०० शीशी बरामद की। यह तो वह माल है जो पुलिस ने रिकॉर्ड में दिखाया है। असल में तो इस से कहीं ज्यादा माल मिला था। अब चूँकि इसकी पहुँच काफी है इसलिए काफी माल पुलिस ने बचा दिया और थोड़ा रख दिया। इसके पिता श्री की पहचान इलाके में गोसेवक के रूप में है। लंबे समय से वे गौशाला के पदाधिकारी हैं। श्रीगंगानगर इलाका नशा कराने में मास्टर है। इस मामले में इसकी दूर दूर तक पहचान है। अब पुलिस ये कहती है कि उन लोगों को सामने लाया जाएगा जो इस प्रकार का धंदा करते हैं। वैसे यह आदमी पुलिस हिरासत में है, मगर साहब को थाने के हवालात में नहीं रखा जाता। कमरे में बिठाया गया है। आम और खास मुलजिम में इतना फर्क तो रखना ही पड़ता है।

Thursday, July 2, 2009

एक से नो तक

समय--१२.३४.५६
तारीख--७.८.९
मतलब, १,२,३,४,५,६,७,८,और ९ एक साथ। ऐसा दुबारा हमारे जीवन में तो होने वाला नहीं। इसलिए उस दिन कुछ ना कुछ तो अलग से होना ही चाहिए। जिस से इस पल की याद हमारे दिलों में रहे। क्या होना चाहिए? आप भी सोचो हम भी सोचतें हैं। जब इतने सब सोचेंगें तो हर हाल में नया विचार आएगा ही।

Monday, June 29, 2009

हर फोटो कुछ कहती है


ये जानदार,शानदार फोटो मुझे रिटायर्ड आई टी ओ सी एल वधवा ने मेल किया था। उनका बहुत बहुत आभार।

Friday, June 26, 2009

तेजाब से जली लड़की की मौत

जिस लड़की पर २२-२३ जून की रात को तेजाब डाला गया था उसकी मौत हो गई। उसका जयपुर में इलाज चल रहा था। इस मामले में पुलिस ने एक लड़के को तो पकड़ लिया। अभी कई जनों की गिरफ्तारी और हो सकती है। वैसे तो यह कहानी पूरी फिल्मी है, जो भारत-पाक सीमा पर बसे श्रीकरनपुर कस्बे से आरम्भ होती है। लेकिन चूँकि अब इसका एक मुख्य किरदार ही नहीं रहा तो कुछ भी लिखना ठीक नहीं है। हमारी संस्कृति तो दुश्मन के मृत शरीर को भी आदर मान देने की है। इसलिए किसी के जाने के बाद कुछ कहना अच्छा नहीं।

Thursday, June 25, 2009

यस, कमेंट्स प्लीज़

आज के ही दिन १९७५ में हिंदुस्तान में आपातकाल तत्कालीन सरकार ने लगा दिया था। तब से लेकर आज तक देश की एक पीढी जवान हो गई। इनमे से करोड़ों तो जानते भी नहीं होंगें कि आपातकाल किस चिड़िया का नाम है। आपातकाल को निकट से तो हम भी नहीं जानते,हाँ ये जरुर है कि इसके बारे में पढ़ा और सुना बहुत है। तब इंदिरा गाँधी ने एक नारा भी दिया था, दूर दृष्टी,पक्का इरादा,कड़ा अनुशासन....आदि। आपातकाल के कई साल बाद यह कहा जाने लगा कि हिंदुस्तान तो आपातकाल के लायक ही है। आपातकाल में सरकारी कामकाज का ढर्रा एकदम से बदल गया था। कोई भी ट्रेन एक मिनट भी लेट नहीं हुआ करती। बतातें हैं कि ट्रेन के आने जाने के समय को देख कर लोग अपनी घड़ी मिलाया करते थे। सरकारी कामकाज में समय की पाबन्दी इस कद्र हुई कि क्या कहने। इसमे कोई शक नहीं कि कहीं ना कहीं जयादती भी हुई,मगर ये भी सच है कि तब आम आदमी की सुनवाई तो होती थी। सरकारी मशीनरी को कुछ डर तो था। आज क्या है? आम आदमी की किसी भी प्रकार की कोई सुनवाई नहीं होती। केवल और केवल उसी की पूछ होती है जिसके पास या तो दाम हों, पैर में जूता हो या फ़िर कोई मोटी तगड़ी अप्रोच। पूरे देश में यही सिस्टम अपने आप से लागू हो गया। पता नहीं लोकतंत्र का यह कैसा रूप है? लोकतंत्र का असली मजा तो सरकार में रह कर देश-प्रदेश चलाने वाले राजनीतिक घराने ले रहें हैं। तब हर किसी को कानून का डर होता था। आज कानून से वही डरता है जिसको स्टुपिड कोमन मैन कहा जाता है। इसके अलावा तो हर कोई कानून को अपनी बांदी बना कर रखे हुए है। भाई, ऐसे लोकतंत्र का क्या मतलब जिससे कोई राहत आम जन को ना मिले। आज भी लोग कहते हुए सुने जा सकते हैं कि इस से तो अंग्रेजों का राज ही अच्छा था। तब तो हम पराधीन थे।
कोई ये ना समझ ले कि हम गुलामी या आपातकाल के पक्षधर हैं। किंतु यह तो सोचना ही पड़ेगा कि बीमार को कौनसी दवा की जरुरत है। कौन सोचेगा? क्या लोकतंत्र इसी प्रकार से विकृत होता रहेगा? कोमन मैन को हमेशा हमेशा के लिए स्टुपिड ही रखा जाएगा ताकि वह कोई सवाल किसी से ना कर सके। सुनते हैं,पढ़तें हैं कि एक राज धर्म होता है जिसके लिए व्यक्तिगत धर्म की बलि दे दी जाती है। यहाँ तो बस एक ही धर्म है और वह है साम, दाम,दंड,भेद से सत्ता अपने परिवार में रखना। क्या ऐसा तो नहीं कि सालों साल बाद देश में आजादी के लिए एक और आन्दोलन हो।

Tuesday, June 23, 2009

नो कमेन्ट प्लीज़

श्रीगंगानगर में अज्ञात व्यक्ति ने एक लड़की पर तेजाब डाल दिया। लड़की ५५प्रतिशत जल गई है। उसकी एक आँख की रोशनी जाती रही। लड़की नर्सिंग कॉलेज में सेकंड इयर की छात्रा है। उसकी हालत देखते हुए उसको श्रीगंगानगर से बीकानेर रेफर किया गया है। घटना के समय लड़की अपने घर की छत पर सो रही थी, ऐसा बताया गया है। फिलहाल इतना ही।

Monday, June 22, 2009

परिवार के चार लोगों का गला काटा

श्रीगंगानगर के निकट है,हनुमानगढ़ जिला। इस जिले के नोहर कस्बे के निकट एक चक में रात को एक ही परिवार के चार सदस्यों की गला रेत कर हत्या कर दी गई। जिनको मारा गया उनमे एक लड़की तीन साल की और दूसरी एक साल की थी। इन लड़कियों के माता पिता को भी मर दिया गया। हत्या के कारणों का तो अभी पता नहीं लगा है।
कोई आदमी इतना भी निर्दयी हो सकता है! छोटी-छोटी मासूम सी बच्चियों का गला काटते हुए उसके हाथ तक नहीं काम्पे,उसका दिल इतना पत्थर था कि उसको बिल्कुल दया नहीं आई। ऐसा क्या अपराध कर दिया उन लड़कियों ने। आज सुबह सबसे पहले यही ख़बर मिली।
इस हत्या काण्ड से किसी की दिनचर्या में कोई असर नहीं पड़ा। सिवाय पुलिस,प्रेस जैसे काम से जुड़े लोगों के। इनके भी असर कहाँ पड़ता है,हाँ भागदौड थोडी अधिक हो जाती है।

Sunday, June 21, 2009

तूफान पर भी नहीं पड़ती नजर

किसी पेड़ की,किसी भी साख से
पत्ता भी गिरता,तो,हो जाती थी ख़बर,
अब तो तूफान भी, पास से
निकल जाए, तब भी, पड़ती नहीं नजर।
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ना जाने किस किस की ख़बर
रहती थी, जेब में हमारे,
अब तो, ख़ुद के बारे में भी
ख़ुद को, कुछ पता नहीं होता।
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ये समय का फेर है कोई
या फ़िर, भाग्य का कोई खेल,
जो मिलते थे बाहें पसार कर
होता नहीं कभी, अब, उनसे कोई मेल।

Friday, June 19, 2009

पी,पी,पी और एक और पी


पब्लिक,पुलिस,प्रेस और पॉलिटिकल लोग। मतलब चार पी। आम तौर पर ये कहा,सुना जाता है कि इनमे आपस में खूब ताल मेल होता है। एक दूसरे के पूरक और एक दूसरे की जरुरत हैं,सभी पी। हाँ, ये जरुर हो सकता है कि कहीं कोई दो पी में अधिक घुटती हैं,कहीं किसी दो पी में। ऐसा तीन पी के साथ भी हो सकता है,चार पी के साथ भी। श्रीगंगानगर के बारे में थोड़ा बहुत हम समझने लगे हैं। सम्भव है हमारी सोच किसी और से ना मिलती हो। हमें तो ये लगता है कि हमारे यहाँ पुलिस और प्रेस का मेल मिलाप बहुत बहुत अधिक है। यूँ कहें कि इनमे चोली दामन का साथ है,दोनों में जानदार,शानदार,दमदार समन्वय,सामंजस्य है। यह सब लगातार देखने को भी मिलता रहता है।श्रीगंगानगर की पुलिस कहीं भी कोई कार्यवाही करे,केवल जाँच के लिए जाए,छापा मारी करे, प्रेस भी उनके साथ होती है। कई बार तो ऐसा होता है कि पुलिस कम और प्रेस से जुड़े आदमी अधिक होते हैं। कभी पुलिस आगे तो कभी प्रेस। कई बार तो ये भ्रम होता है कि पुलिस के कारण प्रेस वाले आयें हैं या प्रेस के कारण पुलिस। अब जहाँ भी ये दोनों जायेंगें,वहां के लोगों में घबराहट होना तो लाजिमी है। इन दो पी में ऐसा प्रेम बहुत कम देखने को मिलता है। प्रेस का तो काम है,एक्सक्लूसिव से एक्सक्लूसिव फोटो और ख़बर लाना,उसको अख़बार में छापना। काम तो पुलिस भी अपना ही करती है,लेकिन प्रेस के कारण उसको इतनी अधिक मदद मिलती है कि क्या कहने। एक तो अख़बारों में फोटो छप जाती हैं। दूसरा, प्रेस पर अहसान रहता है कि उनको मौके की तस्वीर पुलिस के कारण मिल गई। तीसरा,पुलिस अपराधी पर दवाब जबरदस्त तरीके से बना पाती है। सबसे खास ये कि पुलिस किसी नेता या अफसर का फोन सिफारिश के लिए आए तो उसे ये कह कर टरका सकती है-सर,आप जैसा कहो कर लेंगें मगर यह सब अख़बारों में आ गया। सर, अख़बारों में फोटो भी छप गई,पता नहीं प्रेस को कैसे पता लगा गया कार्यवाही का। सर....सर....सर..... । इसके अलावा अन्दर की बात भी होती है। जैसे,पुलिस जिनके यहाँ गई उनको ये कह सकती है कि भाई, प्रेस साथ में हैं हम कुछ नहीं कर सकते। अब कार्यवाही के समय कौनसी फोटो लेनी है, कौनसी नहीं। कौनसी व्यक्तिगत है,कौनसी नहीं, ये या तो पुलिस बताये[ कई बार संबंधों के आधार पर पुलिस ऐसा बताती भी है। तब प्रेस को फोटो की इजाजत नहीं होती] या फ़िर प्रेस ख़ुद अपने विवेक से निर्णय ले। पब्लिक को तो पता ही नहीं होता कि प्रेस कौनसी फोटो छाप सकता है कौनसी नहीं। इन सब बातों को छोड़कर इसी मुद्दे पर आतें हैं कि श्रीगंगानगर में प्रेस-पुलिस का आपसी प्रेम [ एक और पी] बना रहे। अन्य स्थानों के पी भी इनसे कुछ सीखें। इन पी को हमारा सलाम।

Thursday, June 18, 2009

आपातकालीन स्थिति के लिए

Dear All,
We all carry our mobile phones with names & numbers stored in its memory। But nobody, other than ourselves, knows which of these numbers belong to our closest family or friends। If we were to be involved in an accident or were taken ill, the people attending on us would have our mobile phone but wouldn't know who to call। Yes, there are hundreds of numbers stored ; but which one is the contact person in case of an emergency? Hence this "ICE" (In Case of Emergency) Campaign।
The concept of "ICE" is catching on quickly। It is a method of contact during emergency situations. As cell phones are carried by the majority of the population, all you need to do is store the number of a contact person or persons who should be contacted during emergency under the name "ICE" ( In Case Of Emergency).
The idea was thought up by a paramedic who found that when he went to the scenes of accidents, there were always mobile phones with patients, but they didn't know which number to call। He therefore thought that it would be a good idea if there was a nationally recognized name for this purpose. In an emergency situation, Emergency Service personnel and hospital Staff would be able to quickly contact the right person by simply dialing the number you have stored as "ICE." For more than one contact name, simply enter ICE 1, ICE 2 and ICE 3 etc. A great idea that will make a difference!Let's spread the concept of ICE by storing an ICE number in our mobile phones today!!! !
Please forward this. It won't take too many "forwards" before everybody will know about this. It really could save your life, or put a loved one's mind at rest .
यह पोस्ट मेरे एक शुभचिंतक ने भेजी है। उन्होंने इसे मेल किया ताकि इसको अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाया जा सके। उसी मकसद से पोस्ट यहाँ डाली गई है। इस उम्मीद के साथ कि है कोई इसे आगे और आगे भेजेगा।

Wednesday, June 17, 2009

एक टेंशन तो समाप्त हुई

सुबह सुबह एक क्रिकेट प्रेमी मित्र मिल गए। मिलते ही बोले,चलो एक टेंशन तो मिटी। सोचा, रात को मिले तो ठीक थे। अचानक ऐसा रात को क्या हुआ और जो ठीक भी हो गया। मैंने पूछा,कौनसी टेंशन? वह बोला, भारत की क्रिकेट टीम टी-२० से बाहर हो गई। करोडों देशवासियों को चिंता रहती,क्या होगा? जीतेंगें, हारेंगें! अब ये चिंता तो समाप्त हुई। इतना कह कर वे चले गए। लेकिन मैं सोच रहा था कि उनकी एक ही टेंशन समाप्त हुई है। इसका मतलब उनको और भी टेंशन है। सचमुच और बहुत सी टेंशन हैं घर घर में। जैसे बालिका वधु में सुगना का क्या होगा? माँ सा का व्यवहार बदलेगा या नहीं? महलों वाली रानी कुंदन के घर चली गई! हाय अब क्या होगा?रानी उसको सुधार कर कब घर आयेगी?वैसे एक सड़क दुर्घटना के कारण ऐसा होता है यह पहली बार देखा।घर घर में इस बात की टेंशन भी है कि क्या ज्योति की जिंदगी में खुशियाँ फ़िर से आएँगी?क्या होगा जब अक्षरा और ऋतुराज आमने सामने होंगें? हमको ये टेंशन नहीं कि बुजुर्ग मम्मी-पापा को डॉक्टर के पास लेकर जाना है। उनके लिए आँख की दावा या चश्मा लाना है।
हमारे मुहं में रोटी का निवाला होता है,आँख टीवी पर,एक हाथ रिमोट पर,दिमाग बाजार के किसी काम या दफ्तर में और कान वो सुन रहे होते हैं जो बीबी,मां या बच्चे कुछ बोल रहे हैं। फ़िर हम कहते हैं कि आजकल भोजन में स्वाद नहीं आता। स्वाद , स्वाद तो जब आएगा जब तुम भोजन करोगे। रिमोट हाथ में लेकर बार बार चैनल बदल रहें हैं। पता नहीं आपके अन्दर का आदमी कौनसा चैनल देखना चाहता है। जीरो से लेकर सौ तक देखा,फ़िर जीरो पर आ गए। उसके बाद वही एक,दो,तीन लगातार सौ तक। इसका कारण है कि हमारा दिमाग टीवी में नहीं कहीं ओर है।
कल एक जैन मुनि श्री प्रशांत कुमार से मिलने का अवसर मिला। उन्होंने एक पुस्तक"सफलता का सूत्र" दी। इस किताब में एक जगह लिखा है-शिक्षित सा दिखने वाला एक युवक दौड़ता हुआ आया और टैक्सी ड्राईवर से बोला-"चलो,जरा जल्दी मुझे ले चलो। " हाथ का बैग उसने टैक्सी में रखा और बैठ गया। ड्राईवर ने टैक्सी स्टार्ट कर पूछा ,साहब कहाँ जाना है?युवक बोला,सवाल कहाँ -वहां का नहीं है,सवाल जल्दी पहुँचने का है। बस हम जल्दी पहुंचना चाहते हैं, लेकिन लक्ष्य तय नहीं किया।

Tuesday, June 16, 2009

श्रीगंगानगर को मिला नया कलेक्टर






श्रीगंगानगर को नया जिला कलेक्टर मिल गया। लंबे इंतजार के बाद आशुतोष एटी पेडणेकर श्रीगंगानगर में जिला कलेक्टर नियुक्त किए गए। उन्होंने कार्य संभालने के कुछ घंटे बाद ही प्रेस कांफ्रेंस की। लंबे समय के बाद ये पहले कलेक्टर हैं जिन्होंने मीडिया को बुलाया। इस से पहले कितने ही कलेक्टर आए चले गए,कभी प्रेस कांफ्रेंस नहीं की। ऐसा नहीं कि मीडिया से नहीं मिलोगे तो कलक्टरी नहीं होगी। वह तो होगी ही। लेकिन मीडिया प्रशासन और पब्लिक के बीच की कड़ी तो है ही। मीडिया में भी चाहे कितनी ही कमियां आ गईं हों, इसके बावजूद पब्लिक अब भी मीडिया पर विश्वास तो करती ही है। ऐसी जगह, जहाँ एक दर्जन दैनिक अखबार निकलते हों, वहां का मीडिया कुछ तो अवश्य होता होगा।

नए कलेक्टर ने अपनी बात कही। अपनी और सरकार की प्राथमिकताएं बताई। साथ में कहा कि रिजल्ट तुंरत देखने को मिलेंगें। श्री आशुतोष ने आने से पहले गूगल सर्च में श्रीगंगानगर के बारे में जाना,नगर का नक्शा देखा। नगर की तारीफ की। किंतु उनको ये नहीं मालूम कि श्रीगंगानगर के लोगों का स्वभावबिल्कुल अलग किस्म का है। यहाँ तो, जो जनता का हो गया वह सब कुछ पा जाता है। हेकड़ी में रहकर, केवल दफ्तर में बैठ कर कलक्टरी करने वाला यहाँ अधिक पापुलर नहीं होता। हाँ, यह तो सम्भव है कि बड़े अख़बार के संपादक उनके आजू बाजू बैठकर उनकी शान में कशीदे पढ़ें, उनको शब्दों के अलंकरण भेंट करें,उनकी बड़ी बड़ी फोटो छपकर अख़बार दिखाएँ। किंतु असली कलेक्टरी तो वह होगी जिसमे जनता को कुछ राहत मिलेगी,जनता बिना किसी टेंशन के रहेगी,उनको लगेगा कि यह कलेक्टर तो हमारे लिए ही है। फिलहाल गुड लक टू न्यू कलेक्टर। इस उम्मीद के साथ कि कुछ होगा। जैसे मीडिया को बुलाकर नई शुरुआत की।

Monday, June 15, 2009

पूर्व मंत्री को बिरादरी ने दुत्कारा

श्रीगंगानगर के विधायक हैं,राधेश्याम गंगानगर। इन्होने १९७७ से लेकर २००८ के विधानसभा चुनाव तक अपनी अरोड़ा बिरादरी के दम पर राजनीति की। चार बार विधायक चुने गए। कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे। इनको इलाके में अरोड़ा बिरादरी के पॉप कहा जाता था। सच भी था, श्रीगंगानगर में कल से पहले अरोड़वंश का अध्यक्ष राधेश्याम के आशीर्वाद से ही बनता था। मगर कल उनको उनकी अरोड़ा बिरादरी ने ही दुत्कार दिया। अरोड़वंश समाज ने विधायक राधेश्याम गंगानगर के लड़के वीरेंद्र राजपाल को हराकर एक युवा अजय नागपाल को अपना प्रधान चुन लिया। राधेश्याम गंगानगर ने अपने राजनीतिक जीवन में छोटी बड़ी कई हार जीत का सामना किया। किंतु अपनी बिरादरी में इस प्रकार की हार से वे पहली बार दो चार हुए हैं। उनकी अब तक की राजनीति केवल और केवल अरोड़ा बिरादरी के दम पर ही रही। क्योंकि श्रीगंगानगर में इनकी बिरादरी के वोटों की संख्या सबसे अधिक है। अपनी बिरादरी के वोटों की संख्या के चलते उन्होंने गत विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का टिकट ना मिलने पर बीजेपी का दामन थामा और जीत हासिल की। लेकिन छः माह में बिरादरी ने उनसे किनारा कर लिया। जिस अजय नागपाल ने प्रधानगी का चुनाव जीता है,वह भी बीजेपी का है। लेकिन उसके साथ कांग्रेस के लीडर सबसे अधिक लगे हुए थे। राधेश्याम विरोधी तो उसके साथ थे ही।
राधेश्याम गंगानगर अपने घर हुई इस हार को किस प्रकार लेंगें,फिलहाल कुछ कहना मुश्किल है। सम्भव है वे बीजेपी को अलविदा कहकर अपनी पुरानी पार्टी कांग्रेस में लौट जायें। राधेश्याम कांग्रेस को अपनी मां कहा करते थे। हो सकता है किसी दिन वे प्रेस कांफ्रेंस में यह कहते नजर आयें, सपने में मेरी कांग्रेस मां आई, कहने लगी,बेटा अब लौट आ मेरे पास। इसलिए मैं कांग्रेस में आ गया,मतलब मां के पास लौट आया। वे ये भी कह सकते हैं, माता कुमाता नहीं होती,बेटा कपूत हो सकता है। देखो, आने वाले दिनों में श्रीगंगानगर की राजनीति में नया क्या होता है। क्योंकि कोई ये सोच भी नहीं सकता था की राधेश्याम गंगानगर को अपनी बिरादरी में ही मात खानी पड़ सकती है। बिरादरी के दम पर जिसने हमेशा राजनीति की हो,उसको बिरादरी दुत्कार दे तो कुछ ना कुछ सोचना तो पड़ता ही है। जब राधेश्याम गंगानगर कुछ सोचेंगें तो तब कुछ न कुछ तो नया होगा ही। आख़िर उन्हें यहाँ की राजनीति का राज कपूर ऐसे ही तो नहीं कहा जाता। राज कपूर फिल्मो के शो मेन थे तो राधेश्याम यहाँ की राजनीति के।

Saturday, June 13, 2009

आप नहीं होते तो.......


आप नहीं होते तो
हम,खूब अंगडाई
लेते हैं,इठलाते हैं,
आपके आते ही
छुई-मुई की भांति
अपने आप में
सिमट जाते हैं।
ये क्या है
ऐसा क्यों होता है
हम नहीं जानते,
हाँ,इतना तो है
आप के सिवा
हम किसी को
अपना नहीं मानते।

Friday, June 12, 2009

ज़िन्दगी और मौत के बीच

विडियो में जो बिस्तर पर दिख रहा है, वह है, सुशील कुमार। यह आजकल यहाँ, श्रीगंगानगर होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज में भर्ती है। गर्दन से नीचे का उसका शरीर काम नही करता। उसकी यह हालत कई साल पहले हुई। उसकी गर्दन में कोई तकलीफ थी। उसने देश के जाने माने हॉस्पिटल, आल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस,नई दिल्ली, में अपना इलाज करवाया। लगातार दो दिन दो ओपरेशन किए गए। यह युवक इसी प्रकार बिस्तर पर पड़ा भगवान और डॉक्टर से मौत मांग रहा है। जिस मेडिकल कॉलेज में यह भर्ती है,वहां इससे कोई पैसा नहीं लिया जा रहा। कॉलेज के एमडी घनश्याम शर्राफ ने बताया कि मैनेजमेंट इसके इलाज और भोजन का खर्च तो वहां कर ही रही है,इसके साथ साथ इसके बच्चे को भी संस्थान में फ्री शिक्षा दी जायेगी। समाजसेवा भावी कई नागरिक लाचार सुशील की मदद को आगे आ रहें हैं। आज श्रीराम तलवार,लालचंद,प्रेम तंवर आदि ने हॉस्पिटल जाकर सुशील को आर्थिक सहायता दी। उन्होंने और भी सहायता करने का वादा किया। सुशील का परिवार आर्थिक रूप से बिल्कुल टूट चुका है। आज परिवार पैसे पैसे को मोहताज हो गया। उसको आर्थिक मदद की जरुरत है।

नारदमुनि ने सुशील कुमार की तमाम रिपोर्ट्स एक बड़े डॉक्टर से कंसल्ट की। डॉक्टर ने बताया कि सुशील को जो तकलीफ है,वह गंभीर है। ऐसे में रोगी के बचने के चांस एक-दो प्रतिशत ही होते हैं। एम्स की बजाय कहीं ओर इलाज करवाता तो लाखों रुपये लग जाते। उनका कहना था कि आदमी को फांसी लगाने के बाद जिस हड्डी के टूटने से मौत होती है,वही हड्डी सुशील की टूटी हुई थी। एम्स की रिपोर्ट्स के अनुसार वहां इसी बीमारी का ओपरेशन किया गया। एम्स की रिपोर्ट्स में इस बात का उल्लेख है कि रोगी के हाथ-पाँव पहले ही ठीक से काम नहीं कर रहे थे।

Wednesday, June 10, 2009

प्रेम-प्रसंग में मचा बवाल

श्रीगंगानगर में आज दिन में लड़का-लड़की के कथित प्रेम-प्रसंग में बवाल मच गया। लड़की अरोड़ा और लड़का सिख समाज का है। लड़के का कहना है कि लड़की के परिजनों ने उसकी कार को आग लगा दी। उसके बाद उन्होंने उसको[लड़के] भी जलाने की कोशिश की। लड़के का आरोप है कि उसकी दाड़ी के बालों को आग लगाई गई,जिसको तुंरत भुजा दिया गया। इस चक्कर में उसके[लड़के] के हाथ झुलस गए। उप पुलिस अधीक्षक विपिन शर्मा ने बताया कि इस बारे में मुकदमा दर्ज हो चुका है। सिख समाज के लोगों के दवाब में पुलिस एक बार तो आरोपी को अपने साथ थाने ले आई। घटना की सुचना मिलते ही बड़ी संख्या में सिख युवकथाना में पहुँच गए थे। उन्होंने लड़की के पिता के घर भी घेरा डाल दिया था। अगर पुलिस वहां ना पहुँचती तो कुछ भी हो सकता था। पता चला है कि लड़की-लड़की का प्रेम कई सालों से चल रहा था। कुछ समय पहले इस सम्बन्ध में पंचायत भी हुई थी। जिसमे मामला निपटा लिया गया था। लड़के ने लड़की के प्रेम पत्र,फोटो आदि सभी सामान लड़की के परिजनों को वापिस कर दिया था। विडियो में लड़के का बयान। दूसरे विडियो में पुलिस अधिकारी का बयान,पुलिस आरोपी को ले जाते हुए।

मां-बाप का कसूर क्या है

एक घटना,जिसका मेरे,हमारे परिवार,हमारे खानदान से किसी प्रकार का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कोई सम्बन्ध नहीं है। इसके बावजूद इस घटना ने मुझे विचलित कर दिया। बात को थोड़ा पीछे ले जाना होगा। एक मां-बाप ने एक घर में अपने बेटे -बेटियों को पाला, उनके विवाह कर उनको समाज में गृहस्थी चलाने के लिए स्वतन्त्र किया। मां-बाप एक बड़े मकान में रहते थे। ऊपर वाली मंजिल में उनका बेटा अपने परिवार के साथ। बाप रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी,जिसको अच्छी पेंशन मिलती है। घर में बाप-बेटे,सास-बहु में थोडी बहुत खटपट होती होगी, जैसी लगभग हर घर में होती रहती है। मकान बाप का। यह सब कुछ बाप ने अपनी मेहनत से बनाया। बेटों का इसमे कोई योगदान नहीं। एक दिन देखा कि उनके घर के आगे एक वाहन में घर का सामान लदान किया जा रहा था। सोचा, बेटा अपने परिवार को लेकर जा रहा होगा। लेकिन बाद में मालूम हुआ कि बेटा नहीं बाप अपना सामान लेकर कहीं ओर चला गया। छोड़ गया वह घर जो उसने सालों की मेहनत से बनाया था। इसी घर में उसने अपने बच्चों को खेलते,प्यार करते लड़ते देखा था। त्यागना पड़ा उस घर को, जिसके ईंट गारे में, उसकी ना जाने कितनी मधुर स्मृतियाँ रची-बसी थीं। वही घर उनके लिए अब पराया हो गया था।
बाप होने का यह मतलब है कि वह सब कुछ खोता ही चला जाए! एक पिता होने कि इतनी बड़ी सजा कि उसको वह दर छोड़ के जाना पड़े जहाँ उसने अपनी पत्नी के साथ अपना परिवार बनाया,घर को उम्मीदों,सपनों से सजाया संवारा। फ़िर बाप भी ऐसा जो किसी बच्चे पर बोझ नहीं। उसकी पेंशन है। वैसे भी वह अपनी पत्नी के साथ अलग ही तो रहता था। क्या विडम्बना है कि आदमी को अपने ही घर से यूँ रुसवा होना पड़ता है। क्या मां-बाप इसलिए पुत्र की कामना करते हैं?
केवल यह उनके घर का मामला है,यह सोचकर हम चुप नहीं रह सकते। क्योंकि यह हमारे समाज का मामला भी तो है। ठीक है हम कुछ कर नहीं सकते ,परन्तु चिंतन मनन तो कर सकते हैं,ताकि ऐसा हमारे घर में ना हो।सम्भव है कसूर मां-बाप का भी हो। हो सकता है उन्होंने संतान को सब कुछ दिया मगर संस्कार देना भूल गए हों।

Tuesday, June 9, 2009

इम्पोर्टेंट ऑफिस रुल

रुल-१-- बॉस इज ऑलवेज राइट।
रुल-२-- इफ बॉस इज रोंग, प्लीज सी रुल नंबर फर्स्ट।

ऐसे में कोई क्या कर लेगा। है कि नहीं।

Monday, June 8, 2009

कलेक्टर था तो क्या......

ख़बर---श्रीगंगानगर में सात दिनों से जिला कलेक्टर नहीं !
टिप्पणी--- जिला कलेक्टर था तो क्या खास बात थी !

श्रीगंगानगर के जिला कलेक्टर राजीव सिंह ठाकुर एक केन्द्रीय मंत्री के निजी सचिव बन गए। राजस्थान सरकार ने अभी तक नया कलेक्टर नही लगाया है। इस बात को सात दिन हो गए।

Sunday, June 7, 2009

कोई जवाब है क्या

मां तो मां है !

एक बार बरसात में भीगा हुआ मैं घर पहुँचा।
भाई बोला, छाता नहीं ले जा सकता था।
बहिन ने कहा, मुर्ख बरसात के रुकने तक इन्तजार कर लेता।
पापा चिल्लाये, बीमार पड़ गया तो भागना डॉक्टर के पास। सुनता ही नहीं।
मां अपने आँचल से मेरे बाल सुखाते हुए कहने लगी, बेवकूफ बरसात, मेरे बेटे के घर आने तक रुक नहीं सकती थी।
क्यों है कोई जवाब। यह सब मेरे एक शुभचिंतक ने मुझे मेल किया है। उनका दिल से धन्यवाद।

Friday, June 5, 2009

रास्ते का पत्थर, जस्ट फॉर चेंज


अगर तुम समझती हो
मैं रास्ते का पत्थर हूँ,
तो मार दो ठोकर मुझे
पत्थर की ही तरह,
ध्यान रखना तुम्हारे पैर में
कोई चोट ना लग जाए,
कहीं तुम्हारे दिल से
कोई आह ना निकल जाए,
निकली अगर आह तो
इस पत्थर को दुःख होगा,
हट गया रास्ते से तो
दोनों को ही सुख होगा,
फ़िर मैं सड़क के
किनारे पर पड़ा रहूँगा,
इस राह जाने वाले को
कुछ भी नहीं कहूँगा,
बस, मेरा इतना काम
तुम आते जाते जरुर करना,
उसके बाद मेरा फर्ज होगा
दुआ से तुम्हारा दामन भरना।

Thursday, June 4, 2009

राजशाही आने को है हिंदुस्तान में

हिंदुस्तान की संसद में ५४३ सदस्य हैं। इस बार इनमें से कितने ऐसे हैं जो अपने परिवार की विरासत को आगे बढ़ा रहें हैं। इंदिरा गाँधी का तो जैसे सारा कुनबा ही आ गया। देश वासियों को इसकी जानकारी तो होनी ही चाहिए कि संसद में उन सांसदों की संख्या क्या है जिनका कोई रिश्तेदार ना तो पहले कभी सांसद रहा न विधायक। जिस प्रकार की खबरें पढ़ने और देखने में आ रही है उस से तो ऐसा लगता है कि इस बार ऐसे सांसदों की गिनती ज्यादा है जो परिवार वाद के कारण यहाँ तक आयें हैं। यही हाल रहा तो एक दिन संसद में केवल वही बैठे नजर आयेंगें जिनके परिजनों ने कभी यहाँ की शोभा बढाई होगी। इसका मतलब, राजशाही बदले हुए रूप में दिखने लगेगी। तब यहाँ लोकतंत्र की आड़ में राजशाही व्यवस्था काम करेगी। तमिलनाडू, उड़ीसा,पंजाब में तो इसके रंग दिखने लगे हैं।
बचपन में [मेरे बचपन में] मेरे दादा नगरपालिका के मेंबर रहे थे। अगर वे आगे बढ़ते और मैं या परिवार का कोई सदस्य उनका हाथ पकड़ कर आगे बढ़ता तो शायद हम भी इसका हिस्सा बन जाते। ऐसा हो ना सका। ऐसा होता तो यह सब लिखने के कहाँ से आता। तब तो कोई लिखता भी तो बुरा लगता।
खैर! प्रश्न वही कि कितने सांसद परिवार वाद को आगे बढ़ा रहें हैं? अगर किसी को पता हो तो जरुर बताये। जिससे हमारी जानकारी में बढोतरी हो सके।

Tuesday, June 2, 2009

सौ सौ रूपये बस, इतनी मंदी है क्या

बात पाँच चार साल पुरानी होगी। नगर के बहुत बड़े सेठ के यहाँ से शादी का कार्ड आया। कार्ड आया तो जाना ही था। चला गया। लिफाफा ना देने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता था। दूसरे दिन बड़े भाई साहब ने घर पर कार्ड देखा और बोले, शादी में गया था? क्या दिया? मैंने बताया, इकतीस रूपये दिए। उन्होंने कहा, इतने बड़े सेठ के केवल इकतीस! मैंने उनसे कहा, भाई साहब मैंने उनकी हैसियत के हिसाब से नही अपनी हैसियत के अनुसार दिए हैं। उनकी हैसियत से तो जो भी देता कम ही पड़ते। यह सच्ची बात आज नॉएडा में हुई उस प्रेस कांफ्रेंस की भूमिका में जिसमे प्रेस नोट के लिफाफे में सौ सौ रूपये दिए गए पत्रकारों को। मेरे हिसाब से तो आयोजकों ने अपनी प्रतिष्ठा और हैसियत से सौ सौ रूपये दिए। अगर उन्होंने पत्रकारों की हैसियत के अनुसार दिए तो यह बहुत ही चिंता का विषय है। चिंता इसलिए कि जहाँ मीडिया की तोपें रहतीं हैं वहां प्रेस कांफ्रेंस में केवल सौ सौ रूपये! बड़े ही अफ़सोस की बात है। इतनी मंदी तो नहीं है कि केवल सौ सौ रूपये में काम चलाया जाए। एक टीवी चैनल पर मैंने ख़ुद देखा। लिफाफे में सौ का नोट था। अगर नॉएडा जैसे महानगर में प्रेस कांफ्रेंस का यह स्तर है तो हमारे शहर में क्या होगा? हे भगवन ! किसी लीडर ने यह ख़बर ना देखी हो,वरना यहाँ तो फ़िर पाँच-पाँच,दस -दस ही लिफाफे में आयेंगें। ऐसे में तो जीना मुश्किल हो जाएगा।
चैनल वाले न्यूज़ एंकर ने इस बात का खुलासा नहीं किया कि पत्रकार क्यों भड़के? केवल और केवल सौ रूपये देख कर या रूपये देख कर। वैसे जब चुनाव में खुल्लम खुल्ला रूपये लेकर खबरें छापी और छपवाई गई तो उसके बाद यही तो होना था। सब नेता जानते हैं कि ख़बर तो मालिक ने छापनी है। प्रेस कांफ्रेंस में आने वाले तो बस कर्मचारी हैं। इसलिए जो उनके दे दिया वह उनपर अलग से मेहरबानी ही तो है। इसमे इतना लफड़ा करने की क्या बात है। जिसने लेना है ले जिसने नही लेना ना ले।

कोई शिकायत नहीं तो राम राज्य ही है

हाय राम ! ये लड़का। ये कोई कहानी नहीं, हकीकत है। एक लड़की के मुहं से ये शब्द तब निकले जब उसने अपनी बाइक पर एक पर्ची देखी। लड़की ने अपनी सहेली को बताया की लड़का आज फ़िर कुछ लिख कर बाइक पर रख गया। यह समस्या एक लड़की के साथ नहीं है। कुछ बनने की चाह में लड़कियां केवल ओह !,आह ! करके रह जाती हैं। क्या करियर अब हमारे सम्मान ,प्रतिष्ठा,चरित्र,स्वाभिमान से भी ऊँचा बहुत ऊँचा नहीं हो गया है?आत्म सम्मान ,मान अपमान तो अब दकियानूसी और पुराने ज़माने की बात हो गई। जिनका करियर के सामने अब कोई महत्व नहीं। किसी को बताएं तो अपमान का डर और ना बताएं तो हर रोज की प्रताड़ना।
कुल्हे से नीचे गिरने को तैयार घीसी हुई जींस,पैरों में हवाई चप्पल या पट्टी वाले स्लीपर। बाल बिखरे हुए। ये वो लडकें हैं जो पैदल या बाइक पर आपको ऐसे स्थानों पर आते जाते दिखाई देंगे जहाँ लड़कियों का अधिक आना जाना होता है। ये लड़के लड़कियों का पीछा करतें हैं,उनको पीछे घूम कर देखते हैं,उन पर कमेंट्स करतें हैं,और किस्म किस्म की आवाज अपनी बाइक ने निकालते हैं। लड़कियों के निकट जाकर मुस्कुरातें हैं। लड़कियों के पास इनकी यह बदतमीजी सहने के अलावा कोई चारा नहीं होता। यह रोज होता है। अभिभावक कहाँ तक उनकी रक्षा करें? सम्भव है कुछ लड़के लड़कियों का आपस में दोस्ती का रिश्ता हो, लेकिन लड़कों की आवारा आंखों का सामना सभी लड़कियों को करना पड़ता है।
कुछ बनने की चाह में लड़कियां किसी ने किसी कोचिंग सेंटर में कुछ पढ़ने जातीं हैं। कोई भी कोचिंग सेंटर ऐसा नहीं होगा जो लड़के लड़कियों को अलग अलग कोचिंग देता हो। लड़कियों को अलग कोचिंग हो तो लड़के नहीं आते। यह कोचिंग सेंटर चलाने वालों की मज़बूरी है। उनके तो बस धन चाहिए। पुलिस ने काफी हाय तौबा के बाद एक अभियान चलाकर कुछ आवारा लड़कों को पकड़ा। उनके माता पिता को थाने बुलाया और उनकी आवारा सम्पति उनको सौंप दी गई। पुलिस चाहती तो ऐसे लड़कों की फोटो अख़बारों में छपवा कर बता सकती थी,सावधान ये हैं आवारा लड़के! मगर पुलिस तो शरीफ है। वह ऐसा क्यों करने लगी। पुलिस अफसरों के परिवारों की लड़कियां तो गाड़ी में आती जाती हैं इसलिए उनकी बला से किसी और की लड़की के साथ कुछ भी हो उनको क्या! लड़कियों के परिजन मान,अपमान के डर,पुलिस के सौ प्रकार के सवाल जवाब,उनके झंझट के भय से कोई शिकायत नहीं करते। जब कोई शिकायत ही नहीं है तो शहर में राम राज्य है। नारायण नारायण।

Sunday, May 31, 2009

एसपी साहब ! आप तो सुरक्षित हैं ना


यह श्रीगंगानगर के एक आम आदमी का दर्द है जो यहाँ के "प्रशांत ज्योति" नामक अख़बार में एक पत्र के रूप छापा गया है।बॉर्डर से लगे इस जिला मुख्यालय पर एक समान जंगल राज है। आप की सुरक्षा आप को ही करनी है। अधिकारियों को बता भी दें तो कुछ होने की उम्मीद नहीं होती। यूँ तो पुलिस की गश्त भी होती है,हर गली मोहल्ले के लिए बीट अधिकारी होता है। लेकिन इसके बावजूद आवारा लोग सांड की तरह से दनदनाते घूमते हैं। कहने को तो यहाँ लोकतंत्र के वे सभी प्रकार के जनप्रतिनिधि भी हैं जो अन्य नगरों में पाए जाते हैं। यहाँ तो नेताओं और अधकारियों का ऐसा गठजोड़ होता है कि उसमे चुप्प रहा कर मीडिया भी अपना रोल शानदार ढंग से निभाता है। वह लल्लू पंजू, छोटे कर्मचारियों के खिलाफ तो लिख कर वाहवाही लूट लेते हैं। जिला कलेक्टर,एसपी के कामकाज पर कोई टिप्पणी करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। उनकी नजरों में तो सब को भला बने रहना है। इसी कारण से श्रीगंगानगर के हालत दिन पर दिन बिगड़ रहें हैं ।

Saturday, May 30, 2009

राहुल गाँधी हैं सबके सीइओ

कौरवों-पांडवों का महाभारत समाप्त हो चुका था। विजयी पांडवों में अब यह बात घर कर गई कि वे सबसे अधिक बलवान हैं। उन्होंने ना जाने कितने ही रथी,महारथी,वीर,महावीर,बड़े बड़े लड़ाकों को मृत्यु की शैया पर सुला दिया। मगर फैसला कौन करे कि जो हैं उनमे से श्रेष्ठ कौन है। सब लोग श्रीकृष्ण के पास गए। उन्होंने कहा, मैं भी मैदान में था, इसलिए किसी और से पूछना पड़ेगा। वे बर्बरीक के पास गए। जिन्होंने पेड़ से समस्त महाभारत देखा था। श्रीकृष्ण बोले, बर्बरीक बताओ क्या हुआ, किसने किस को मारा। बर्बरीक कहने लगा,मैंने तो पूरे महाभारत में केवल श्रीकृष्ण का सुदर्शन चक्र ही देखा जो सब को मार रहा था। मुझे तो श्रीकृष्ण के अलावा किसी की माया, शक्ति,वीरता नजर नही आई। बर्बरीक का भाव ये कि जो कुछ महाभारत में हुआ वह श्रीकृष्ण ने ही किया। हाँ नाम अवश्य दूसरों का हुआ।चलो अब हिंदुस्तान की बात करें। मनमोहन सिंह की सरकार बन गई। मंत्रियों को उनके विभाग दे दिए गए। लेकिन समझदार मीडिया बार बार यह प्रश्न कर रहा है कि राहुल गाँधी मंत्री क्यों नहीं बने? राहुल मंत्री कब बनेगें? अब कोई इनसे पूछने वाला हो कि भाई जो ख़ुद सरकार का मालिक है उसको छोटे मोटे मंत्रालय में बैठाने या बैठने से क्या होगा?जो समुद्र में कहीं भी जाने आने, किसी भी जलचर को कुछ कहने का अधिकार रखता है उसको पूछ रहें हैं कि भाई तुम तालाब में क्यों नहीं जाते? क्या आज के समय प्रधानमंत्री तक राहुल गाँधी को किसी बात के लिए ना कह सकते हैं? और राहुल गाँधी ने जिसके लिए ना कह दिया उसको हाँ में बदल सकते हैं? बेशक राहुल गाँधी किसी को कुछ ना कहें, मगर ये ख़ुद सोनिया गाँधी भी जानती हैं कि किसी में इतनी हिम्मत नहीं जो राहुल गाँधी को इग्नोर कर सके। आज हर नेता राहुल गाँधी का सानिध्य पाने को आतुर है ताकि उसका रुतबा बढे। एक टीवी चैनल पर पट्टी चल रही थी। " शीश राम ओला राहुल गाँधी से मिले। ओला ने राहुल के कान में कुछ कहा। " श्री ओला राजथान के जाट समुदाय से हैं। उनकी उम्र राहुल गाँधी की उम्र से दोगुनी से भी अधिक है। जब ऐसा हो रहा हो तब राहुल गाँधी को किसी एक महकमे के चक्कर में पड़ने की क्या जरुरत है। हिंदुस्तान की समस्त धरती, आकाश उनका है। वे किसी झोंपडी में सोयें या महल में क्या अन्तर पड़ता है। ये तो जस्ट फॉर चेंज। मनमोहन सिंह सरकार के प्रधान मंत्री हैं, कोई शक नही। सोनिया गाँधी कांग्रेस की अध्यक्ष और यू पी ऐ की चेयरपर्सन हैं। मगर इस सबसे आगे राहुल गाँधी सीईओ हैं। आज के ज़माने में सीईओ से महत्व पूर्ण कोई नहीं होता। इसलिए राहुल गाँधी मंत्री बनकर पंगा क्यों लेने लगे। भाई सारा जहाँ हमारा है। समझे कि नहीं।

Thursday, May 28, 2009

हीरा और लोहे का अन्तर

एक संत की कथा में एक बालिका खड़ी हो गई। उसके चेहरे आक्रोश साफ दिखाई दे रहा था। उसके साथ आए उसके परिजनों ने उसको बिठाने की कोशिश की,लेकिन बालिका नहीं मानी। संत ने कहा, बोलो बालिका क्या बात है?। बालिका ने कहा,महाराज घर में लड़के को हर प्रकार की आजादी होती है। वह कुछ भी करे,कहीं भी जाए उस पर कोई खास टोका टाकी नहीं होती। इसके विपरीत लड़कियों को बात बात पर टोका जाता है। यह मत करो,यहाँ मत जाओ,घर जल्दी आ जाओ। आदि आदि। संत ने उसकी बात सुनी और मुस्कुराने लगे। उसके बाद उन्होंने कहा, बालिका तुमने कभी लोहे की दुकान के बहार पड़े लोहे के गार्डर देखे हैं? ये गार्डर सर्दी,गर्मी,बरसात,रात दिन इसी प्रकार पड़े रहतें हैं। इसके बावजूद इनकी कीमत पर कोई अन्तर नहीं पड़ता। लड़कों की फितरत कुछ इसी प्रकार की है समाज में। अब तुम चलो एक जोहरी की दुकान में। एक बड़ी तिजोरी,उसमे फ़िर छोटी तिजोरी। उसके अन्दर कोई छोटा सा चोर खाना। उसमे से छोटी सी डिब्बी निकालेगा। डिब्बी में रेशम बिछा होगा। उस पर होगा हीरा। क्योंकि वह जानता है कि अगर हीरे में जरा भी खरोंच आ गई तो उसकी कोई कीमत नहीं रहेगी। समाज में लड़कियों की अहमियत कुछ इसी प्रकार की है। हीरे की तरह। जरा सी खरोंच से उसका और उसके परिवार के पास कुछ नहीं रहता। बस यही अन्तर है लड़ियों और लड़कों में। इस से साफ है कि परिवार लड़कियों की परवाह अधिक करता है।
इसी के संदर्भ में है आज की पोस्ट। जिन परिवारों की लड़कियां प्लस टू में होती हैं। उनके सामने कुछ नई परेशानी आने लगी है। होता यूँ है कि कोई भी कॉलेज वाले स्कूल से जाकर लड़कियों के घर के पते,फ़ोन नम्बर ले आता है। स्कुल वाले भी अपने स्वार्थ के चलते अपने स्कूल की लड़कियों के पते उनको सौंप देतें हैं। उसके बाद घरों में अलग अलग कॉलेज से कोई ना कोई आता रहता है। कभी कोई स्टाफ आएगा कभी फ़ोन और कभी पत्र। यह सब होता है शिक्षा व्यवसाय में गला काट प्रतिस्पर्धा ले कारण। स्कूल वालों को कोई अधिकार नहीं है कि वह लड़कियों के पते,उनके घरों के फोन नम्बर इस प्रकार से सार्वजनिक करें। ये तो सरासर अभिभावकों से धोका है। ऐसे तो ये स्कूल लड़कियों की फोटो भी किसी को सौंपने में देर नहीं लगायेंगें। जबकि स्कूल वालों की जिम्मेदारी तो लड़कियों के प्रति अधिक होनी चाहिए। अगर इस प्रकार से स्कूल, छात्राओं की निजी सूचना हर किसी को देते रहे तो अभिवावक कभी भी मुश्किल में पड़ सकते हैं। आख़िर लड़कियां हीरे की तरह हैं, जिनकी सुरक्षा और देखभाल उसी के अनुरूप होती है।
नारदमुनि ग़लत है क्या? अगर नहीं तो फ़िर करो आप भी हस्ताक्षर।

Wednesday, May 27, 2009

राहुल गाँधी के नाम पत्र




राजस्थान के डेंटल कॉलेज के विद्यार्थी अपनी मांगें मनवाने के लिए हड़ताल पर हैं। उन्होंने जयपुर से राहुल गाँधी को पत्र लिखा। उसकी प्रति उन्होंने हमें भेजी। यह प्रति पोस्ट की गई है। उम्मीद है विद्यार्थियों की जायज मांग मान ली जाएँगी। विद्यार्थी एक समिति बना कर आन्दोलन कर रहें हैं। आशा है कि कोई तो नेता इस को पढेगा और विद्यार्थियों की बात सरकार तक लेकर जाएगा।

Monday, May 25, 2009

लेफ्ट को कर दिया राइट


वोटरों ने इस बार
लेफ्ट को कर दिया राइट,
ऐसे में ममता का फयूचर
हो गया, कुछ ब्राईट,
पासवान की दुकान
उन्होंने कर दी बंद,
लालू की लालटेन में
कम कर दी लाईट,
मुलायम हो गए
कुछ अधिक सॉफ्ट,
माया को कर दिया
बिल्कुल ही टाईट।

Sunday, May 24, 2009

अधिकारियों का माफिया ग्रुप

राजस्थान में जितने भी भारतीय प्रशासनिक सेवा,पुलिस सेवा और राजस्थान प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं उनमे से अधिकांश एक बार अपनी पोस्टिंग श्रीगंगानगर जिले में होने की तमन्ना रखते हैं। इसके लिए मैंने ख़ुद अधिकारियों को नेताओं के यहाँ हाजिरी लगाते,मिमियाते देखा है। कितने ही अधिकारी हमारे जिले में सालों से नियुक्त हैं। सरकार किसी की हो,ये कहीं नहीं जाते। वैसे तो ये सरकार की ओर से जनता की सेवा और उनके काम के लिए होतें हैं। अधिकारी की कोई जाति भी नहीं होती, क्योंकि उनको तो सब के साथ एक सा व्यवहार करना होता है। किंतु श्रीगंगानगर में ये सब कुछ नहीं रहता। यहाँ इन अधिकारियों की जितनी मनमर्जी चलती है उतनी राजस्थान में कहीं नहीं चलती। यहाँ एक दर्जन से अधिक दैनिक अख़बार निकलते हैं,इसके बावजूद अधिकारियों में पर किसी का अंकुश नहीं है। किसी अधिकारी के खिलाफ किसी अख़बार में कुछ नहीं छपता। चाहे अधिकारी कितनी भी दादागिरी करे। गत दिवस एक अधिकारी की कार्यवाही का विरोध हुआ। उस अधिकारी ने अपनी जाति के संगठन को आगे कर दिया। उसके बाद अधिकारियों की बैठक हुई। एकजुटता दिखाई गई। ऐसा हुआ तो ये कर देंगे,वैसा हुआ तो वो कर देंगे, स्टाईल में बातें हुईं। जैसे माफिया होते हैं। इसका मतलब सीधा सा कि जनता को जूते के नीचे रखो, नेता जी कुछ करेंगें नहीं क्योंकि वही तो हमें लेकर आयें हैं। अधिकारियों के अन्याय का विरोध करो तो सब अधिकारी जनता के खिलाफ हो जाते हैं। कितनी हैरानी की बात है कि जिन अधिकारियों को जन हित के लिए सरकार ने लगाया,वही अधिकारी दादागिरी करतें हैं। एक परिवार ने एक अधिकारी द्वारा की गई दादागिरी दिखाने, बताने के लिए एक संपादक को फ़ोन किया। संपादक का कहना था कि आप किसी होटल में बुलाओ। पीड़ित ने कहा, सर हम तो मौका दिखाना चाहते हैं। लेकिन ना जी , संपादक ने यह कह कर मौके पर आने,अपना प्रतिनिधि भेजने से इंकार कर दिया कि आप हमें इस्तेमाल करना चाहते हैं। अब जनता किसके पास जाए। नेता के पास जाने से कुछ होगा नहीं। अधिकारी डंडा लिए बैठें हैं। संपादक जी मौके पर आना नहीं चाहते। ऐसी स्तिथि में तो जनता को ख़ुद ही कुछ करना होगा। जब जनता कुछ करेगी तो फ़िर वही होगा जो अक्तूबर २००४ में घड़साना-रावला में हुआ था। तब करोडों रुपयों की सम्पति जला दी गई थी। पुलिस की गोली से कई किसान मारे गए थे। हम ये नहीं कहते कि यह सही है,मगर जब सभी रास्ते बंद हो जायें ,कोई जायज बात सुनने को तैयार ही ना हो, अफसर केवल फ़ैसला सुनाये, न्याय न करे तो आख़िर क्या होगा? बगावत !
काफी लोग कहेंगें कि आपने संपादक और अधिकारियों के नाम क्यों नहीं लिखे? इसका जवाब है , हम भी एक आम आदमी हैं, इसलिए इनसे डरते हैं, डरतें हैं।

Saturday, May 23, 2009

बारूद के ढेर पर श्रीगंगानगर

श्रीगंगानगर! भारत पाक सीमा के निकट महाराजा गंगा सिंह द्वारा बसाया गया एक नगर। साम्प्रदायिक सदभाव की मिसाल श्रीगंगानगर। यहाँ के सदभाव को ना तो गुजरात के दंगे तोड़ सके ना पंजाब का आतंकवाद। जबकि श्रीगंगानगर पंजाब से केवल ५ कीमी दूर है। मगर अब कहानी कुछ कुछ बिगड़ने लगी है। एक चिंगारी शोला बन जाती है। गत दिवस ऐसा ही हुआ। नगर में आगजनी हुई,तोड़फोड़ हुई। कई घंटे लोग टेंशन में रहे। लेकिन इस बात की चिंता अधिकारियों को तो होने क्यों लगी। चिंता नगर वालों को होनी चाहिए, उनको भी नहीं है। अगर बॉर्डर वाले नगर में जिसके तीन तरफ़ सैनिक छावनियां और एक तरफ़ पाकिस्तान हो वहां तो अधिक से अधिक सावधानी बरतनी चाहिए, सभी पक्षों की ओर से। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यह खतरनाक संकेत है इस नगर के लिए। अगर यही हाल रहा तो एक दिन सम्भव है ऐसा आए जब किसी के हाथ में कुछ नहीं होगा। जिसके हाथ में होगा वह बॉर्डर के उस पर बैठा हमारी नासमझी पर ठहाके लगा रहा होगा। बड़ी घटना की शुरुआत इसी प्रकार छोटी छोटी घटनाओं की रिहर्सल से ही तो होती है। अफसरों का क्या है श्रीगंगानगर नहीं तो और कहीं। मगर यहाँ के लोगों का क्या होगा? इसका जवाब किसी के पास नहीं हैं। यह कितना गंभीर मामला है लेकिन टीवी न्यूज़ चैनल्स वालों को इस प्रकार की ख़बर चाहिए ही नहीं। ये तो सब के सब सत्ता के आस पास रहे। । दिल्ली जयपुर के अख़बारों के लिए भी शायद यह कोई ख़बर नहीं थी। कितनी अचरज की बात है कि बॉर्डर पर बसे राजस्थान के इस श्रीगंगानगर के चिंता किसी को नहीं है। नारदमुनि तो केवल अपने प्रभु से प्रार्थना ही कर सकता है। पता नहीं प्रभु को भी समय है कि नहीं।

Monday, May 18, 2009

बैंक के पन्द्रह लाख रूपये लूटे







श्रीगंगानगर पुलिस प्रशासन की छाती पर आज एक और तगमा लग गया। श्रीगंगानगर से ४० किलोमीटर दूर पदमपुर कस्बे में दिन दिहाड़े बाइक पर आए तीन चार लोग ओबीसी बैंक के पन्द्रह लाख रूपये लुट कर ले गए। ओबीसी बैंक के दो कर्मचारी दूसरे बैंक से पन्द्रह लाख रूपये लेकर बाइक पर अपने बैंक जा रहे थे। रास्ते में एक सुनसान गली में पहले से खड़े तीन चार लोगों ने उनपर लाठियों से वार किया। जिस से दोनों कर्मचारी नीचे गिर गए। उसके बाद लूटेरे रुपयों वाला बैग लेकर बाइक पर भाग गए। पुलिस मोके पर पहुँच गई है। जिले भर में नाकाबंदी कर दी गई है। अभी तक लुटेरों का कोई सुराग नहीं लगा है। पदमपुर क़स्बा राजस्थान सरकार के मंत्री गुरमीत सिंह कुन्नर का निवास है।

श्रीगंगानगर में दंगा

भारत पाक सीमा पर बसा श्रीगंगानगर भगवान भरोसे है। प्रशासन.लीडर,आमजन तो इसकी ऐसी की तैसी करने में लगा रहता है। रात को एक छोटी सी चिंगारी ने नगर में दंगे का रूप ले लिया।नगर के एक इलाके में अराजकता हो गई। नेशनल राजमार्ग १५ पर कई घंटे दंगाइयों का राज रहा। बिजली के एक ट्रांसफार्मर में से निकली चिंगारी के कारण २ आदमी झुलस गए। बस उसके बाद दंगा भड़क गया। लोगो ने पत्थर बरसाए। पुलिस ने लाठी। दंगाइयों को जो मिला उसको आग के हवाले कर दिया। लोगो के घरों के बहार खड़े वाहनों को तोड़ दिया। जिस इलाके में यह सब हो रहा था वहां बिजली गुल कर दी गई। जिस से दंगा करने वालों को और अधिक शह मिल गई। इलाके की चारों ओर से नाकाबंदी कर दी गई। किसी को इस ओर आने की इजाजत नहीं दी गई। शहर में अफवाहों को दौर शुरू हो गया। किसी ने कहा दो मर गए,किसी ने मरने वालों की संख्या तीन बताई। इस संवेदनशील जिला मुख्यालय पर इस प्रकार का नकारा प्रशासन शायद ही पहले कभी आया हो। जिला कलेक्टर,पुलिस अधीक्षक तो शहर को शायद पूरा जानते भी न होंगें। इनमे इतना गरूर है कि क्या कहने। इनका नगर के लोगों से कोई लाइजनिंग नहीं हैं। शहर के हजारों लोग टेंशन में रहे। लोगों को नुकसान उठाना पड़ा। धन्य हैं वे नेता जो ऐसे महान अफसरों को श्रीगंगानगर में लेकर आयें हैं। जो प्रशासन एक राई को पहाड़ बनने से नहीं रोक सका उस से अधिक उम्मीद करना बेकार है। लेकिन क्या करें उम्मीद पर दुनिया कायम है। आज सुबह तो हालत काबू में बताये गएँ हैं।

Sunday, May 17, 2009

आडवानी जी आराम करो



--चुटकी--

उम्र हो गई ज्यादा
अब आप करो आराम,
हमारा तो स्वीकार करो
जय जय जय सिया राम।

---गोविन्द गोयल

Saturday, May 16, 2009

सच्ची मुच्ची पाँच साल बाद नजर आए

इस विडियो में श्रीगंगानगर के नव निर्वाचित सांसद भरत राम मेघवाल हैं। भरत राम पहली बार हमें २००४ के लोकसभा चुनाव में नजर आए। तब वे बीजेपी के निहालचंद से ७३०० वोट से हार गए थे। उसके बाद वे २००९ में हमें दिखाई दिए तब, जब उनको कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार बनाया। आज भरत राम श्रीगंगानगर के सांसद निर्वाचित हो गए। उन्होंने बीजेपी के निहालचंद को १४०६६८ वोट के अन्तर से हराया। अब जीतने के बाद भरत राम जी कब दर्शन देंगे कहना बहुत मुश्किल है। क्योंकि अब तो उनकी व्यस्तता बढ़ जायेगी। २००४ में हारने के बाद भी जब उनको समय नहीं मिला तो अब कैसे सम्भव है। अब तो उनके कंधो पर देश की समस्याओं का बोझ आ गया। देखो अब इनके दीदार कब होतें हैं।

आज प्रार्थना करने का दिन है

आज प्रार्थना का दिन है। कहते हैं कि प्रार्थना में बहुत अधिक शक्ति होती है। प्रार्थना की जरुरत इसलिए है क्योंकि आज यह तय होने वाला है कि अब भारत की जनता को कौन हांकेगा। चूँकि हमने परिवार सहित ईश्वर के सामने प्रार्थना करनी थी इसलिए जल्दी उठ गया। हालाँकि बच्चों , बीबी ने काफी शोर मचाया, सोने दो, हमें क्या पड़ी है,पड़ोसियों के यहाँ से भी खर्राटों की आवाज आ रहा है। सारा देश ही सो रहा है इसलिए तुम भी मुह पर कपड़ा ढक कर सो जाओ। लेकिन हमारे पर तो देशभक्ति के भूत सवार हो गया। इसलिए न सोये न सोने दिया।स्नान करके सब के सब लग गए ईश्वर से प्रार्थना करने। हे! ईश्वर तुम अगर हो तो इतना ध्यान रखना कि हमारा देश वह चलाये जिसको घर चलाना आता हो। अब हमारे हाथ में तो कुछ है नही। हमने तो हमारे हाथ कटवा लिए। अब तो हम यही चाहते हैं कि हमें किसी मुर्ख के हाथों मार ना खानी पड़े। हमने मार तो खानी है लेकिन कोई समझदार मारेगा तो लगेगा कि हमारी शान बन रही है। हे ! ईश्वर कोई ऐसा ना आ जाए जो मारे भी और रोने भी ना दे। रोने से मन हल्का हो जाता है बस, दर्द थोड़े ना जाता है। ईश्वर जी आप तो जानी जान हो, सबका भूत,वर्तमान और भविष्य जानते हो। यह भी निश्चित रूप से जानते होंगें कि वह कौन होगा जो देश को एक बंदी की भांति चलाएगा। जो केवल अपनी गद्दी बचाने के साम,दाम,दंड और भेद सबका इस्तेमाल करना जानता होगा। किंतु उसको यह नहीं पता होगा कि देश और देशवासियों का भला कैसे होता है। खैर,ईश्वर जी जो आपने सोच रखा है उसको बदलने की ताकत तो किसी में नहीं है। लेकिन इतनी प्रार्थना करने का हक़ तो है कि कोई ऐसा हमारी छाती पर बिठाना जो हमें कम से कम तकलीफ दे।

आप जानते हैं कि आज देश भर में वोटों की गिनती होनी है। और कोई काम तो आज,कल,परसों होगा नहीं। यह गिनती तय करेगी कि देश में किसकी सरकार होगी। अरे! मैं भी किसको बताने लगा। आप ही तो करने वाले हैं यह आप की ही तो लीला है। हे! कृपानिधान आपके कलयुगी नारदमुनि और उसके परिवार की प्रार्थना पर समय मिले तो गौर करना। क्योंकि आज आपके यहाँ तो बड़े बड़े नेताओं की भीड़ लगी होगी। इस भीड़ के पीछे देख लेना आपका नारदमुनि कहीं दुबका खड़ा होगा। मन में यही प्रार्थना लिए कि हे नारायण इस देश पर दया करना। इस पर कोई आंच ना आए। इस देश के लोग हमेशा मुस्कुराते रहें, हर हाल में हर वक्त। बाकी आपकी मर्जी। बड़े बड़े लोगों के बीच में पता नहीं मेरी प्रार्थना आप तक पहुँचेगी भी या नहीं। हम तो कहते हैं सब के सब देश वासी आज प्रार्थना करें अपने अपने ईश्वर से।

Friday, May 15, 2009

श्रीगंगानगर का पारा चढा और चढा

श्रीगंगानगर अपनी भयंकर गर्मी के लिए देश भर में जाना जाता है। यहाँ आजकल गर्मी का पारा ४६ डिग्री सेल्सियस से अधिक हो चुका है। चलो पारा तो चढ़ना था चढा, इस पर सरकार का पारा भी हाई हो गया। उसने इस भयंकर गर्मी में हर रोज चार घंटे बिजली कट लगा दिया। करलो जो करना है, चुनाव तो हो गए। कट भी दोपहर में लगता है। मर्जी है इनकी क्योंकि सरकार इनकी है। राजस्थान में श्री अशोक गहलोत के सीएम बनते ही यह सब शुरू हो जाता है। अब भला इतनी गर्मी में बिना बिजली के शहर में रहना कितना मुश्किल है। वह भी उस दशा में जब सूरज ढलते ही मच्छरों का राज सरकार के राज पर भरी हो जाता है। सरकार से तो मच्छर भी नहीं मरते। है कोई ऐसा सरकारी नेता जो यह कहता हो कि वह बिजली कट में आम जन की तरह रह कर दिखा सकता है। कोई तो बताये कि क्या सीएम,मुख्य सचिव,सरकार के मंत्रियों के घरों दफ्तरों की बिजली भी कटती है क्या? प्लीज जरुर जरुर बताना! ऐसा नहीं कि हम आपकी बिजली काट के खुश हैं। हम तो दुनिया को यह बताना चाहते हैं कि देखो हमारा सीएम आम आदमी की भांति गर्मी में अपना समय गुजारता है। पता नहीं वह समय कब आएगा जब एक सीएम आम आदमी की तरह रहता दिखाई देगा। आम आदमी का सीएम बनना तो लोकतंत्र में कोई खास बात नहीं लेकिन सीएम का एक आम आदमी की तरह रहना जरुर खास और बहुत खास बात होगी। सॉरी, मैं तो सपने देखने लगा। वह भी इतनी गर्मी में जागते हुए। हाय ओ रब्बा मुझे माफ़ करना। मैंने भी क्या देख लिया । ऐसा भी कभी होता है क्या इस लोकतंत्र में। लोकतंत्र तो वही है जहाँ नेता राजा की भांति और आमजन निरीह प्राणी की भांति अपना समय काटें।

Tuesday, May 12, 2009

राजनीति की फ्रैंडली फाइट समाप्त

राजनीति की फ्रैंडली फाइट अब एक बार तो समाप्त हो गई। अब तो पोलाइट होने का वक्त है। यह समय की मांग भी है। जैसे--आप तो बड़े सुंदर लग रहे हो...... । आप कौनसे कम हो...... । आपकी चाल बहुत जानदार है.... । आप बोलते बहुत अच्छा हैं..... । आपकी साड़ी का जवाब नहीं। अरे साहब आप पर तो कुरता पायजामा बहुत ही फबता है.... । अरे यार तूने मेरे खिलाफ बहुत कुछ कहा.... । तो तूने भी कौनसी कसर रखी..... । अरे भाई तू तो मेरा स्वभाव जानता है....फ़िर जनता को संदेश भी तो देना था..... । लेकिन इन सब से वोटर तेरे खिलाफ हो गया.... । क्या हुआ , तेरे को तो फायदा हो गया.... । तेरा फायदा अपना ही तो है। हाँ यह बात तो है ही। आख़िर घी खिचड़ी में ही तो जाएगा। यही हम चाहते भी हैं। हम सब यही तो देख और पढ़ रहें हैं आजकल। जो कल तक एक दूसरे को फूटी आँख नहीं सुहाते थे वही इनदिनों एक दूसरे की प्रशंसा करने में लगे हैं।
अब तो सब के सब नेता अभिनेता बन कर एक दूसरे को रिझाने की कोशिश में लगे हैं। एक दूसरे के निकट आने के बहाने तलाश किए जा रहें हैं। प्रेमियों की तरह मिलने और बात करने के अवसर खोजे या खुजवाये जा रहें हैं। मीडिया भी इस काम में इनकी मदद करता दिखता है। पहला दूसरे से दूरी बनाये था, दूसरा तीसरे से । चौथा अकेला चलने के गीत गा रहा था। देखो वोटर का खेल खत्म हो गया। शुरू हो चुका है असली खेल। सत्ता को अपनी रखैल बनने का खेल, अपनी दासी,बांदी बनाने का खेल,कुर्सी को अपने या अपने परिवार में रखने का खेल। इन सबका एक ही नारा होगा, वही नारा जो शायद बचपन में सभी ने कहा या सुना होगा " हमें भी खिलाओ,वरना खेल भी मिटाओ"। सम्भव है कुछ लोग एक बार किसी के साथ सत्ता के खेल में शामिल हो जायें और बाद में अपना बल्ला और गेंद लेकर चलते बनें। खेल चल रहा है, देखना है कौन किसको खिलायेगा। हाँ इस खेल में देश की जनता का कोई रोल नहीं है। इस खेल से सबसे अधिक कोई प्रभावित होगा तो वह जनता ही है,किंतु विडम्बना देखो अब इस खेल में उसकी कोई भागीदारी नही है।

Sunday, May 10, 2009

आशीर्वाद के बाद माँ की भेंट

जैसे ही माँ को चरण स्पर्श किए माँ ने आशीर्वाद के साथ एक जिल्द वाली किताब हाथ में दे दी और बोली, ले इसे इसको रख ले, अब मैंने क्या करनी है। "भक्ति सागर" नामक यह पुस्तक माँ के पास तब से देख रहांहूँ जब से मैंने होश संभाला है। यह पुस्तक भी की तरह काफी वृद्ध हो चुकी है। इसमे भी ज्ञान भरा हुआ है जैसे माँ के अन्दर में। किताब के पन्ने अब थोड़े बहुत टूटने फटने लगे है। मगर उसके अन्दर समाहित ज्ञान में किसी प्रकार की कमी नहीं आई है। सालों पहले जब कभी माँ इसको पढ़ती नजर आती तो मैं भी उसको कभी कभार पढ़ लिया करता था। अब अरसे बाद यह भक्ति सागर मुझे माँ के हाथ में दिखाई दिया। माँ अब पढ़ नही सकती इसलिए यह उनकी किसी पेटी या अलमारी में रखा हुआ था। जब से माँ ने इस पुस्तक को मुझे दिया है,तब से मन विचलित रहने लगा। क्योंकि माँ ने इस भक्ति सागर को कभी अपने से अलग नहीं किया था। अब उन्होंने अचानक अपने इस सागर को मेरी झोली में डाल दिया। मन डरा डरा सा है। क्योंकि माँ से पहले और बाद में कुछ भी नहीं है। माँ धरती की तरह अटल है और आकाश की भांति अनंत। चन्द्रमा की भांति शीतल है और सूरज की तरह ख़ुद जल कर संतान के अन्दर मन में उजाला करने वाली। माँ के मन की गहराई तो कई समुद्र की गहराई से भी अधिक होगी। एक माँ ही तो है जिसको कोई स्वार्थ नहीं होता। अपना पूरा जीवन इस बात के लिए समर्पित कर देती है कि उसकी सन्तान सुखी रहें। किताब को तो पढ़तें रहेंगे,माँ को आज तक नहीं पढ़ पाए। कोई पढ़ पाया है जो हम ऐसा कर सकें। जितना और जब जब पढ़ने की कोशिश की उतना ही डूबते चले गए प्रेम,त्याग,स्नेह,ममत्व की गहराइयों में। माँ ने आज तक कुछ नहीं माँगा। सुबह से शाम तक दिया ही दिया है। उनके पास देने के लिए ढेरों आशीर्वाद है। हमारा परिवार बड़ा धनवान है । हम हर रोज़ उनसे जरा से चरण स्पर्श कर खूब सारे आशीर्वाद ले लेतें हैं सुखी जीवन के। मेरा तो व्यक्तिगत अनुभव है कि अगर आपके पास माँ के आशीर्वाद का कवच है तो फ़िर आपके पथ सुगम है। कोई भी बाधा,संकट,परेशानी आपकी देहरी पर अधिक समय तक रहने की हिम्मत नहीं कर सकती। माँ का आशीर्वाद हर प्रकार की अल बला से बचने की क्षमता रखता है। एक बार दिन की शुरुआत उनके चरण स्पर्श करके करो तो सही, फर्क पता चल जाएगा।

Saturday, May 9, 2009

फ़िर बेच देंगे अपना जमीर

मशीनों में बंद हो गई
नेताओं की तकदीर,

जैसे तैसे कुर्सी पाने की
कर रहें हैं तदबीर,

कुर्सी मिल जाए तो
एक बार फ़िर से
बेच देंगे अपना अपना जमीर।

Thursday, May 7, 2009

पप्पू भी नहीं बने, वोट भी नहीं डाला

"अगर आप वोट नहीं करते तो आप सो रहें हैं"। पप्पू ना बनो वोट डालो। हमने श्रीगंगानगर लोक सभा क्षेत्र के किसी उम्मीदवार को वोट नहीं डाला। लेकिन हमने बाकायदा अपने लेफ्ट हाथ की अंगुली पर स्याही का निशान लगवाया और राइट हाथ से हस्ताक्षर किए। किन्तू मशीन पर किसी का बटन नहीं दबाया। बात हुई ये कि काफी
मगजमारी के बाद मेरे पोलिंग बूथ के पीठासीन अधिकारी इस बात से सहमत हो गए कि आप किसी को वोट न देना चाहो तो न दो,हम रजिस्टर पर यह लिख देंगें कि आपने इन उम्मीदवारों में से किसी भी उम्मीदवार के पक्ष में वोट डालने से इंकार कर दिया। उन्होंने अपने सहयोगी से यह टिप्पणी रजिस्टर पर लिखवाई" इनमे से किसी भी उम्मीदवार को वोट देने से इंकार कर दिया"। उसके बाद उन्होंने मेरे हस्ताक्षर करवाए और अपने ख़ुद के किए।ऐसा केवल मैंने नहीं किया। ऐसे वोटर कई हैं जिन्होंने इस प्रकार से अपनी नापसंदगी जाहिर की। एक बूथ पर तो एक वकील के ऐसा करने पर कई और ऐसा की करने को अपने आप राजी हो गए। बेशक इस प्रकार से उम्मीदवारों को नापसंद करने वालों की संख्या दर्जन भर ही हो, मगर कहीं से शुरुआत तो है। शुरुआत होने के बाद ही कोई बात दूर तक जा पाती है।

वोट डालो,छूट पा लो


बताओ तो ऐसा कौन है ?

श्रीगंगानगर में मेरे घर आई [ मंगवाई] राजस्थान पत्रिका के पहले पेज पर ये लिखा है। बटन दबाने से पहले सोचिये...... । जिस प्रत्याशी को आप चुनने जा रहें हैं वह राष्ट्रीय सोच रखता हो। समझदार और शिक्षित हो। आसानी से उपलब्ध हो। निर्भीक और निष्पक्ष हो। अपनी जाति नहीं सबका हो। क्षेत्र व प्रदेश की बात मजबूती से रखता हो। अपराधी ना हो। जाति व धर्म की बात ना करता हो।भ्रष्टाचारी न हो,ईमानदार हो। सच में उम्मीदवार तो ऐसा ही होना चाहिए। लेकिन अख़बार में ये नहीं बताया कि ऐसा उम्मीदवार कौन है। यूँ तो अख़बार में यहाँ के मुख्य प्रताशियों के बारे में लगातार खबरें, आलेख छापें हैं। किंतु इन में से एक भी वैसा नहीं जिसे यह निर्णय किया जा सके कि पत्रिका के अनुसार यह बन्दा वोट का सही हक़दार है। अख़बार ने लोगों को वोट देने के लिए बहुत अधिक प्रोत्साहित किया है। परन्तु बात वही कि यह कहीं कोई संकेत नहीं की यह प्रत्याशी सही है। खैर मुझे वोट देने जाना है। इस बार बहुत से वोटर पीठासीन अधिकारी से यह पूछने वाले हैं कि हमने जो प्रत्याशी हैं उनमे से किसी को वोट नही देना। इसलिए इसका विकल्प बताओ। मेरी बहुत वोटर से इस बारे में बात हुई है। बहुत से वोटरों ने कहा कि १५ में से कोई नहीं। इसलिए इन सबको रिजेक्ट करना है। पता नहीं पीठासीन अधिकारी क्या करेगा। राजस्थान में आज वोटिंग है। अगर कहीं हमारे जैसी स्तिथि है तो पीठासीन अधिकारी से विकल्प पूछा जाना चाहिए। चाहे ना हो कोई विकल्प,आवाज तो उठे।

Tuesday, May 5, 2009

जवाब कौन देगा ?

स्कूल में कोई क्यूँ जाता है ? पढ़ने के लिए। अगर कोई कमजोर है,पढ़ाई लिखाई ठीक से नहीं कर पाता तो उसपर और अधिक ध्यान देने की जरुरत होती है। परन्तु आजकल जो कुछ हो रहा है उस से तो ऐसा लगता ही नहीं। अब तो दाखिले से पहले टेस्ट लिया जाता है। टोपर है तो अन्दर नहीं तो बाहर। अब कोई इनसे पूछने वाला हो तो भाई जो कमजोर है उसकी कमजोरी कौन दूर करेगा। स्कूल वाले फीस तो थैला भर कर लेते हैं, हम देते हैं। किसके लिए, जो होशियार है उसके लिए। पढ़ाई में कमजोर बच्चे को तो दूर से ही टा टा , बाए बाए कर देते हैं। हमारी भी मत मारी गई। हम भी झूठी सामाजिक शान के लिए इनके नखरे सहते हैं। जिस परिवार में कोई कमजोर बच्चा हो तो उसके लिए आज के दौर में रहना मुश्किल हो जाता है। प्राइवेट स्कूल लेता नहीं सरकारी स्कूल में भेजने से गली मोहल्ले में नाक नीची हो जाती है। सरकार के कोई नियम कानून इनपर लागू नहीं होते। बात बेशक साधारण सी लगती है, मगर है तो सोचनीय। आख़िर वह अभिभावक अपने बच्चे किस स्कूल में पढ़ने के लिए भेजें जिनके किसी कारण से पढ़ाई में कमजोर हैं। सरकार भी ना तो सरकारी स्कूलों की हालत ठीक कर पाती है ना ही प्राइवेट स्कूलों पर कोई अंकुश लगा पाती है। सरकारी स्कूल तो अब केवल नेताओं द्वारा लोगों को नौकरी देकर वाह वाही पाने का जरिया बन कर रह गए है। ताकि चुनाव में यह बताया जा सके कि हमने इतने लोगों को नौकरी दी। पढो,पढाओ के बारे में हर सरकार अरबों रुपया खर्च करती है। लेकिन इन रुपयों से पढ़ कौन रहा है? आम आदमी का लाडला तो आजादी के ६२ साल बाद भी वैसा का वैसा है जैसे उसके बाप दादा थे। यूँ कोई गुदड़ी में लाल निकल गया तो क्या खास बात है। उसमे सरकार का तो कोई योगदान होता ही नहीं। हर कोई उसी को चमकाने में लगा हुआ है जो पहले से चमक रहा है। क्या कभी कोई उस तरफ़ भी देखेगा जिसको सबसे ज्यादा स्कूल की जरुरत है।

Saturday, May 2, 2009

"आर" वाले आगे बाकी मैदान से बाहर

लंबे समय से प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए जबरदस्त मारा मारी मची है। जितनी पार्टी है उस से अधिक प्रधानमंत्री पड़ के दावेदार। आज बहुत से लोगों का तो किस्सा ही ख़तम कर देते हैं। तो सुनो! इस देश का प्रधानमंत्री वही बन सकता है जिसके नाम में कहीं ना कहीं "र" [ आर] अक्षर आता हो। आज तक जितने भी प्रधानमंत्री इस देश में हुए उनके नाम में कहीं ना कहीं र जरुर आया। अब संजय गाँधी नहीं बन सके। ऐसे ही देवी लाल ने १९८९ में अपना ताज वीपी सिंह को पहना दिया था। बहाना कोई भी रहा हो मगर उनके नाम में र नहीं था तो नहीं बने प्रधानमंत्री। अब यह चर्चा है कि सोनिया गाँधी आहत थी इसलिए प्रधानमंत्री नहीं बनीं। लेकिन असल बात ये कि उनके नाम में "र" नहीं है। अब मायावती हो या मुलायम सिंह अपने आप को प्रधानमंत्री का दावेदार बताते हैं मगर लगता तो नहीं कि वे सफल हो जायेंगें। अरे भाई इनके नाम में भी "र" नहीं है। हाँ, राहुल गाँधी हैं, प्रियंका गाँधी हैं, वरुण गाँधी है, शरद पवार भी खुश हो सकते है। नरेंद्र मोदी भी सपने ले सकते है। नारदमुनि के नाम से तो मैं भी ख्वाब देख सकता हूँ। गोविन्द गोयल के नाम से नहीं।
हमारा तो यही कहना है कि जिन नेताओं के नाम में "र"[ आर] नहीं आता वे इस पद के लिए अपना समय ना ख़राब करें। ऐसे नेता किसी दूसरे मंत्रालय के लिए अपने आप को तैयार करें। ऐसे नेताओं को आगे आने दिया जाए जिनके नाम में कहीं ना कहीं "र" [ आर] अक्षर बैठा हुआ है। ये बात आज की नहीं है। १९८३ या १९८४ में मैंने एक लेख लोकल अखबार "सीमा संदेश" में लिखा था। जिसमे आर की बात कही थी। देखो कब तक चलता है ये "र" का चमत्कार। इसको संयोग कहें या टोटका, लेकिन अभी तक तो फिट है। अगर प्रधानमंत्री बनना है तो अपने नाम में कहीं ना कहीं "र"[आर] फिट करना ही पड़ेगा।

Friday, May 1, 2009

सोनिया गाँधी के लिए चार ऐ सी

कांग्रेस की महारानी श्रीमती सोनिया गाँधी को श्रीगंगानगर की गर्मी से बचाने के लिए उनके मंच पर चार एसी लगाये गए। मंच इतना "बड़ा" था की ७ आदमी से वहां भीड़ हो जाती है। दो एसी कुर्सियों के पीछे,एक वहां जहाँ सोनिया जी ने खड़े होकर बोलना था। एक उस ओर जहाँ उनको बैठना था। हर पल देश की सेवा का दम भरने वाले ये नेता देश के लोगों की तरह गर्मी को सहन नहीं करते। कई हजार जनता मामूली पंखों के नीचे बैठे थे जो गर्म हवा उनतक पहुँचा रहे थे। दूसरी तरफ़ सोनिया महारानी चार चार एसी के बीच देश की जनता का सेवक होने की बात कर रही थी। अब यह बात समझ से परे है की एसी लगाने के निर्देश स्थानीय कांग्रेस लीडरों,प्रशासन को सोनिया गाँधी के यहाँ से मिलते हैं या यह सब ये लोग अपनी मर्जी से करते हैं। कितनी हैरानी की बात है कि जिस जनता से आपको वोट लेने हैं वह तो आपके सामने गर्मी में मर रही है औरआप कूल कूल मंच पर से देश के गरीबों,आमजनों,असहाय लोगों की तकलीफ दूर करने की बात करती हैं। सोनिया जी आपने एक बार भी नहीं सोचा कि मेरे आस पास तो इतनी ठंडी हवा आ रही है और वह जनता गर्मी में परेशान हो रही है जिसके सहारे आप को सरकार बनानी है। अगर हमारे देश के शीर्ष नेता ही ऐसा करेंगें तो जनता किस पर भरोसा करे? जब एक लीडर आमजन की तरह रह ही नहीं सकता तो फ़िर वह उनका हमदर्द और लीडर भी कैसे हो सकता है।

Wednesday, April 29, 2009

सोनिया--हेमा गर्मी में मत आना

राजस्थान में मतदान ७ मई होगा। आजकल श्रीगंगानगर में गर्मी के तेवर ४५ डिग्री सेल्सियस के आसपास हैं। ऐसे में हमारे देश की महान आयातित नेता [ जो आयातित होता है उसकी वल्यू ज्यादा समझी जाती है] सोनिया गाँधी जी श्रीगंगानगर आने वालीं है। हेमा मालिनी भी इसी दिन आने की बात कर रहीं हैं।इनका एक मई को श्रीगंगानगर आने का कार्यक्रम है। इतनी गर्मी में इनका आना लोगों को परेशान करना जैसा है। ख़ुद इनको भी कम परेशानी नहीं होगी। बेचारे इनके लीडर भी दुखी होंगें। सभाओं में आजकल लोग वैसे ही नहीं आते। इतनी अधिक गर्मी में उनको घरों से कैसे निकला जाएगा। भीड़ कैसे सभा में ली जाए,इसका गणित लगाया जा रहा है। पहले सभा में नीचे दरी तिरपाल बिछाते थे। इन दिओं कुर्सियां लगे जाती है। इसके बावजूद भीड़ आने की उम्मीद नहीं होती।
सोनिया-हेमा जी आप इस देश की महान नेता हैं। आप जनता की परेशानियों को दूर करने के बड़े बड़े वादे करती हो। इस लिए आप जनता की शुभचिंतक हो। उम्मीद है आप दोनों जनता की परेशानी को समझते हुए श्रीगंगानगर नहीं आयेंगीं। क्योंकि आपकी सभा दोपहर को है ऐसे में लोगों का क्या हाल होगा। भयंकर गर्मी में किसी को कुछ चक्कर-वक्कर आ गया तो आपका और आपकी पार्टी का नाम बदनाम होगा। इसलिए अच्छा है आप ४५ डिग्री तापमान के चलते श्रीगंगानगर का दौरा रद्द कर दें। चुनाव तो हर साल आतें हैं, फ़िर कभी आ जाना।ठीक है।

Monday, April 27, 2009

जरनैल सिंह को ढेर सारे थैंक्स

सॉरी, जरनैल सिंह जी। जिस दिन आपने गृह मंत्री पर जूता फेंका था उस दिन मैंने आपको बहुत बुरा भला कहा था। मैं नादान था गलती हो गई। तब तो नारदमुनि यही समझता था कि आजकल कौन पत्रकारों का अनुसरण करता है। उनके किए और लिखे पर कौन ध्यान देता है? अब समझ आ रहा है कि नारदमुनि तू कितना ग़लत था। उस दिन तो जरनैल सिंह ने जूता फेंक कर देश में एक नई क्रांति की शुरुआत की थी। हम इराकी नहीं हैं जो एक बार में बस कर जायें,हम तो वो हैं जो एक बार कोई बात पकड़ लें तो उसका पीछा नहीं छोड़ते। हाँ, बात ही हमारा पीछा छोड़ दे तो अलग बात है। तो जरनैल सिंह जी आपने जो कुछ पत्रकार के नाते लिखा होगा उसका असर कभी हुआ या नहीं आपको पता होगा, लेकिन आप इस बात की खुशी तो मना ही सकतें हैं कि आपके किए का असर हुआ और लोग भी अब आपके पद चिन्हों पर चल रहें हैं। किसी के लिए इस से ज्यादा खुशी और क्या हो सकती है कि देश वासी उसका अनुसरण कर रहें हैं। जरनैल सिंह जी,नारदमुनि दर दर भटकने वाला अज्ञानी है। आपको कोई सलाह , सुझाव,राय देना सूरज को दीपक दिखाना है। फ़िर भी कुछ कहने की गुस्ताखी कर रहा हूँ। जरनैल सिंह जी आप के पास समय हो तो जूता फेंकने के सम्बन्ध में कुछ टिप्स लोगों को देन। आपने देखा कि आपके जूते ने जितना असर दिखाया था उतना किसी के जूते ने नहीं। इसलिए आप सबको बताओ कि जूता किस एंगल से फेंका जाए। जूता फेंकने वाला नेता से कितनी दूरी पर हो। जूते का वजन लगभग [ मोटे रूप में ] कितना हो। कौनसा समय उत्तम होता है जूता फेंकने के लिए। जूता कोई खास कंपनी का हो या कोई भी कंपनी चलेगी। आप कोई रिकमंड करो तो...... । जूता फेंकने के लिए पहले क्या तैयारी करनी जरुरी है। जूता फेंकने वाले को क्या क्या सावधानी रखनी चाहिए। जूता नया हो या पुराना,या फ़िर नेता की शक्ल सूरत के हिसाब से नया पुराना तय करें।हो सके तो कोई किताब ही लिख डालो। क्योंकि आपके मार्ग दर्शन के बिना जूता क्रांति दम तोड़ सकती है। हम नहीं चाहते कि पत्रकार द्वारा शुरू की गई क्रांति बे असर रहे। जरनैल सिंह जी थोड़ा लिखा ज्यादा समझना। उम्मीद है आप करोड़ों देशवासियों की उम्मीद नहीं टूटने देंगें। कीमती समय में से थोड़ा सा समय निकाल कर मार्गदर्शन जरुर करेंगें।

Sunday, April 26, 2009

दिल की बात आलू के बहाने

पड़ोसन अपनी पड़ोसन से चार पांचआलू ले गई। कई दिनों बाद वह उन आलुओं को वापिस करने आई। मगर जिसने आलू दिए थे उसने आलू लेने से इंकार कर दिया। उसके अनुसार आलू वापिस करना उनके अपमान के समान है। बात तो इतनी सी है। लेकिन है सोचने वाली। क्योंकि उन बातों को अधिक समय नहीं हुआ जब पड़ोसियों में इस प्रकार का लेनदेन एक सामान्य बात हुआ करती थी। यह सब बड़े ही सहज रूप में होता था। इस आपसी लेनदेन में प्यार, अपनापन,संबंधों की मिठास छिपी होती थी। किसी के घर की दाल मोहल्ले में ख़ास थी तो किसी के घर बना सरसों का साग। फ़िर वह थोड़ा थोड़ा सबको चखने के लिए मिलता था। शाम को एक तंदूर पर मोहल्ले भर की महिलाएं रोटियां बनाया करती थीं। दोपहर और शाम को किसी ने किसी के घर के चबूतरे पर महिलाओं का जमघट लग जाता था। पास की कहीं हो रहा होता बच्चों का शोर शराबा। पड़ोस में शादी का जश्न तो कई दिन चलता। मोहल्ले की लड़कियां देर रात तक शादी वाले घर में गीत संगीत में डूबी रहतीं। घर आए मेहमानों के लिए,बारातियों के लिए घर घर से चारपाई,बिस्तर इकठ्ठे किए जाते। किसी के घर दामाद पहली बार आता तो पड़ोस की कई लड़कियां आ जाती उस से मजाक करने। कोई नहीं जाती तो उसकी मां, दादी, चाची ताई लड़की से पूछती, अरे उनके जंवाई आया है तू गई नी। जा, तेरी मासी[ पड़ोसन] क्या सोचेगी। तब आंटी कहने का रिवाज नहीं था। तब हम रिश्ते बनाने में विश्वास करते थे। कोई भाभी थी तो कोई मामी हो जाती। इसी प्रकार कोई मौसी,कोई दादी, कोई चाची, नानी आदि आदि। पड़ोस में नई नवेली दुल्हन आती तो गई की सब लड़कियां सारा दिन उसको भाभी भाभी कहती हुई नहीं थकती थीं। गली का कोई बड़ा गली के किसी भी बच्चे को डांट दिया करता था। बच्चे की हिम्मत नहीं थी कि इस बात की कहीं शिकायत करता। आज के लोगों को यह सब कुछ आश्चर्य लगेगा। ऐसा नहीं है, यह उसी प्रकार सच है जैसे सूरज और चाँद। आज सबकुछ बदल गया है। केवल दिखावा बाकी है। हम सब भौतिक युग में जी रहें हैं। लगातार बढ़ रही सुविधाओं ने हमारे अन्दर अहंकार पैदा कर दिया है। उस अहंकार ने सब रिश्ते, नातों, संबंधों को भुला दिया , छोटा कर दिया। तभी तो पड़ोसन अपनी पड़ोसन को आलू वापिस करने आती है।

Thursday, April 23, 2009

जंगल में हो रहें हैं चुनाव

सियार ने खरगोश को दुलारा
शेर ने हिरण को पुचकारा
भेड़िये देख रहें हैं
राजा बनने के ख्वाब,
हे दोस्त, जंगल में
कैसे आया इतना बड़ा बदलाव।
लोमड़ी मेमने को गले लगाती है
बिल्ली चूहे के साथ नजर आती है
सूअर बकरी के साथ
घास खा रहा है जनाब,
हे दोस्त ,जंगल में
कैसे आया इतना बड़ा बदलाव।
सुनो भाई,इन जानवरों में
अब भी वैसा ही मरोड़ है
जो दिख रहा है वह तो
कुर्सी के लिए गठजोड़ है,
नकली है इनका भाई चारा
बस क्षणिक है ये बदलाव
सच तो ये है दोस्त
जंगल में हो रहें हैं चुनाव।

Tuesday, April 21, 2009

किराये पर कार्यकर्त्ता, ऑफिस शुरू

राजनीतिक दलों की सुविधा के लिए श्रीगंगानगर में रतन नागौरी नामक आदमी ने एक कारोबार आरम्भ किया है। कारोबार है, किराये पर कार्यकर्त्ता उपलब्ध करवाने का। जी हाँ, श्री नागौरी सभी दलों को बिना किसी भेदभाव के किराये पर कार्यकर्त्ता "सप्लाई" करेंगें। सब जानते हैं कि भीड़ जुटाने के लिए नेता जी को अंटी ढीली करनी पड़ती है। अब तक यह काम पर्दे के पीछे से होता था। अब यह सब कुछ बाकायदा व्यावसायिक तरीके से होगा। क्यों हैं ना मजेदार बात। सही बात है जब राजनीति पेशा बन गई है तो फ़िर कार्यकर्त्ता पेशेवर क्यों ना हों। उन्होंने क्या कसूर किया है। मलाई नेता खाते हैं,तो खुरचन खाने का अधिकार तो कार्यकर्त्ता को मिलना ही चाहिए। उम्मीद है श्री नागौरी का यह कारोबार खूब चलेगा। मंदी का असर फिलहाल इन पर नही होगा। चुनाव है भाई।

Monday, April 20, 2009

नेता की औलाद है तू

--- चुटकी----

ना हिंदू बनेगा
ना तू
मुसलमान बनेगा,
नेता की औलाद है
तू नेता बनेगा।
ना जन की सुनेगा
ना गण की सुनेगा,
जिस से मिलेगा फायदा
तू उस मन की सुनेगा।

Sunday, April 19, 2009

महंगाई है महंगाई

सालों पहले रोटी कपड़ा और मकान फ़िल्म में एक गाना था। उस गाने में कहा गया था...... पहले मुठ्ठी में पैसे लेकर थैला भर शक्कर लाते थे,अब थैले में पैसे जाते हैं और मुठ्ठी में शक्कर आती है।
एक फ़िल्म और थी, गोपी। उसका गाना था....रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलयुग आएगा, हंस चुगेगा दाना तुनका कौव्वा मोती खायेगा। इसी गाने में कहा गया था.....चोर उच्चके नगर सेठ और प्रभु भगत निर्धन होंगें,जिसके हाथ में होगी लाठी भैंस वही ले जाएगा.....
क्या कमाल की बात है कि जो आज हो रहा है वह हमारे गीतकारों ने उसकी कल्पना सालों पहले ही कर ली थी। उक्त गानों के ये बोल हमारे आज के जीवन में पूरी तरह से फिट है। वैसे इन बातों को ऐसे भी कह सकतें हैं कि घोडों को घास नहीं मिलती और गधे गुलाबजामुन खा रहे हैं।

Saturday, April 18, 2009

देख तमाशा जूते का

रतलाम,झाबुआ एवं दाहोद [गुजरात] से प्रकाशित "प्रसारण" अखबार के १२ अप्रैल के अंक में जरनैल सिंह के जूते को खास महत्व दिया है। अखबार ने सन्डे मैगजीन "समग्र" में एक दर्जन से अधिक चुनिन्दा चिठ्ठों की पोस्ट प्रकाशित की। यह सब लेखक के नाम और उसके ब्लॉग के लिंक के साथ प्रकाशित किया गया। इसको प्रस्तुत किया पंकज व्यास ने। श्री व्यास ने बाकायदा अखबार भी भेजा। इस में सरिता अरगरे,राकेश त्रिपाठी,जयराम,अमिताभ फरोग,नारदमुनि जी,गणेश कुमार मिश्रा,केपी चौहान,प्रदीप मिश्र,आदर्श राठोर,कौशलेन्द्र मिश्र,संदीप शर्मा,श्यामल शुक्ल,अक्षतविचार.ब्लागस्पाट.कॉम,तीखीनजर.ब्लागस्पाट.कॉम,सरपंचजी आदि की पोस्ट इस अखबार में प्रकाशित की हैं। अख़बार के संपादक ने दो पृष्ठ पर यह सामग्री दी। अखबार के प्रधान संपादक श्री श्रेणिक कोठारी को साधुवाद। श्री पंकज व्यास को शुक्रिया जिन्होंने इस सब की चर्चा की।

ऐसा तो नहीं होता था

दो दिन से टेंशन में हैं नारदमुनि। टेंशन इस बात कि ये इस देश के राजनेता कौन से स्कूल में और किस से पढ़ते थे। नेता जिस प्रकार से मधुर वाणी बोल रहें हैं उसके लिए यह जानना जरुरी है कि उनको इतनी बढ़िया शिक्षा देने वाले मास्टर जी कौन हैं? ताकि जुबान से रस टपकाने वाले इन नेताओं के मास्टरजी को कुछ सम्मान दिया जा सके अगर उन्होंने शर्म से ऐसा वैसा ना कर लिया हो। बहुत मगजमारी की। इन्टरनेट पर भी खूब तलाश किया। इन नेताओं के कार्यकर्ताओं से पूछा। कोई नहीं बता सका कि ये कहाँ से पढ़ कर आयें हैं। १९७७ से चुनाव में रूचि है। पक्ष - विपक्ष के नेता एक दूसरे के खिलाफ बोलते थे,आलोचना होती थी, उसके जवाब दिए जाते थे। मगर सब कुछ मर्यादा में, एक दूसरे की गरिमा का ध्यान रखते हुए। अब तो ऐसा आभास होता है जैसे ये नेता न होकर किसी मोहल्ले के भाई हो, हफ्ता वसूल करने वाले, जो बीच चौराहे पर एक दूसरे की गर्दन पकड़ कर खडें हैं जनता को अपनी अपनी ताकत दिखाने के लिए। ताकि जनता पर प्रभाव डाल कर हफ्ता की डर बढाई जा सके। पता नहीं ये नेता किस की संगत करते हैं जो ऐसा गन्दा बोलते हैं। या तो इनको पढ़ाने वाले ग़लत थे या इनकी संगत ख़राब रही। सम्भव है उम्र का असर होने लगा हो। कोई ना कोई बात तो जरुर है,वरना भारत के नेता ऐसा तो नहीं बोलते थे। होगा तो कोई एक आधा होगा। अब तो सब के सब एक ही थाली के लगाते हैं। छाज के साथ साथ छलनियाँ भी बोलने लगी है। हमको जय हो बोलना चाहिए कि भय हो। हमारे पास तो कोई और विकल्प भी तो नहीं है। कोई है ऐसा जो इनको समझा और बता सके कि जो वे कर रहें हैं वह ग़लत और पूरी तरह से ग़लत है।

Thursday, April 16, 2009

सांई बाबा का चमत्कार, रोटी

श्रीगंगानगर में आजकल सांई बाबा के रोटी वाले "चमत्कार" की गली गली चर्चा है। यह सब कुछ लोगों की आंखों के सामने होता है। गुरुवार के दिन होता है यह सब। चमत्कार है आधी "रोटी" का डेढ़ हो जाना। गुरुवार की शाम को किसी बरतन में वह आधी रोटी रख दी जाती है जो डेढ़ बनी रोटी का हिस्सा हो। "रोटी" के साथ थोड़ी थोड़ी चीनी और चाय पत्ती जरा से पानी के साथ डाल दी जाती है। एक सप्ताह तक सुबह शाम उस बर्तन की पूजा अर्चना की जाती है सांई बाबा के नाम से। फ़िर गुरुवार को वह बरतन खोला जाता है जिसमे आधी रोटी रखीगई थी। बरतन में उस आधी रोटी के साथ एक वैसी ही रोटी और होती है। अगर रोटी आधी से डेढ़ हो गई तो समझो सांई बाबा ने आपकी मन्नत पूरी कर दी। सात दिन तक उस बरतन को खोलना नहीं है। अब जो डेढ़ रोटी है, उसको या तो आधी आधी करके तीन व्यक्तियों को बाँट दो। अगर कोई ना लेना चाहे तो पानी में प्रवाहित कर दो। जो आधी रोटी लेगा उसे सात दिन तक उसकी पूजा करनी होगी। यह सिलसिला इसी प्रकार चलता रहता है। श्रीगंगानगर के कई इलाकों में इन दिनों सांई बाबा के इस "चमत्कार" की धूम मची है। बड़ी संख्या में लोग अपनी मन्नत पूरी करवाने के लिए इस "रोटी" की शरण में जा रहें हैं। जैसे जैसे शरण में आने वालों की संख्या बाद रही है वैसे वैसे "चमत्कार" टॉक ऑफ़ द टाऊन होता जा रहा है।

Wednesday, April 15, 2009

पुलिस ने मचाया ग़दर

श्रीगंगानगर जिले में दो स्थानों पर पुलिस ने ग़दर मचाया। पहला ग़दर उसने रात के अंधेरे में एक किसान के घर मचाया। किसी मुलजिम की तलाश में गए इन पुलिस वालों ने घर वालों को इतना पीटा किउनको हॉस्पिटल में भरती करवाना पड़ा। घर के मुखिया ने बताया भी कि वह वो नहीं है जिसकी तलाश में छपा मारा गया। पुलिस ने नहीं सुनी। पुलिस ने महिलाओं के कपडे फाड़ डाले। पुलिस जानती थी कि जिस घर में छपा मारा गया वह मुलजिम का नहीं है। क्योंकि वह पहले भी आ चुकी थी। घटना के तीन दिन बाद तक एसपी को नहीं मालूम हुया। एसपी से इस बाबत जानकारी लेने के लिए बात कि तो उनका कहना था कि दो दिन बाद आना तब तक मैं सारी पड़ताल करवा लूँगा। इस परिवार ने अब गृह मंत्री से लेकर मानवाधिकार आयोग तक से न्याय की गुहार लगाई है। दूसरी घटना में पुलिस ने हिरासत में चार युवको को बुरी तरह पीटा। घायल युवकों के समर्थन में जिले का एक क़स्बा बंद रहा,मिनी सचिवालय को घेरा गया। उसके बाद कहीं जाकर थानाधिकारी और दो उप निरीक्षकों को ठाणे से हटाया गया। यह आन्दोलन किया कांग्रेस विधायक के पिता और पूर्व मंत्री ने। मतलब कांग्रेस की सरकार में कांग्रेस नेता को पुलिस के खिलाफ मैदान में आना पड़ा। इस जिले की हालत इस से अधिक और ख़राब क्या हो सकती है। जबकि यह जिला पाकिस्तान सीमा पर है। आजकल तो वैसे भी चुनाव का मौसम है। पुलिस का अंदाज अब यह है तो बाद में कैसा होगा?

Monday, April 13, 2009

खो गया आम आदमी

देश में चुनाव की गहमा गहमी में आम आदमी गुम हो गया है। गाँव से लेकर देश की राजधानी तक इस बेचारे की कोई चर्चा ख़बर नही है। कोई पत्रिका,अखबार,न्यूज़ चैनल देख लो किसी में आम आदमी आपको नहीं मिलेगा। जब वह कहीं नहीं है तो इसका मतलब वह खो गया है। "गुम हो गया", "खो गया", ग़लत है, असल में तो उसको गुम कर दिया गया है। जब राजनीति कारोबार बन जाए,मुद्दे बेअदब चलती जुबान के नीचे दब कर दम तोड़ने लगे,जन हित की बजाये हर हाल में सत्ता को पाना ही लक्ष्य हो तो फ़िर आम आदमी की याद किसको और क्यों आने लगी। बड़े बड़े नेता हर रोज़ पता नहीं कहाँ कहाँ जाते हैं। उनके पीछे पीछे होता है मीडिया। लेकिन इनमे से कोई अगर बाजार जाए [ मॉल नहीं] तो इनको महंगाई से लड़ता फटे हाल में आम आदमी मिल जाता। किंतु किसको समय है आम आदमी के लिए! चीनी ३० रूपये के आस पास आने को है। गुड़ चीनी से आगे निकल गया है। दाल क्यों पीछे रहने लगी, उसने भी अपने आप को ऊपर और ऊपर ले जाना आरम्भ कर दिया। आम आदमी महंगाई से लड़ कर दम तोड़ रहा है, नेता आपस में लड़ रहें हैं। यह हैरानी की बात नहीं कि देश में जिस आम आदमी की संख्या सब से ज्यादा है वही चुनाव से गायब है। उसकी चिंता किसी को नहीं। कोई नेता एक बार बाजार जाकर रोजमर्रा की जरूरत वाले सामान के भाव तो पूछे! पूछ भी लेगा तो उसकी सेहत पर क्या असर पड़ेगा? उसकी जेब से कुछ जाना नहीं है। उसके पास तो आना ही है। उस से तो कोई ये भी नहीं पूछता कि भाई तुम ऐसा क्या काम करते हो जिस से तुम्हारी सम्पति हर पाँच साल में दोगुनी,तीन गुनी हो जाती है। क्या कोई ऐसा दल भी है जो आम आदमी को महंगाई के दल दल से निकल कर उसको थोडी बहुत राहत प्रदान कर सके। उम्मीद तो नहीं है, जिस देश में सरकार आई ऐ एस, आई पी एस के बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने का ऐलान करती हो वहां आम आदमी की क्या हैसियत है यह अनुमान लगाना कोई मुश्किल काम नहीं है। हैसियत है ही नहीं। कोई हैसियत होती तो उसको खोजने के लिए अब तक तो पता नही क्या क्या हो चुका होता। आम आदमी गुम ही रहे तो ठीक है उनकी बला से।

Saturday, April 11, 2009

धर्मनिरपेक्ष राजनीति की सच्चाई

----चुटकी----

हिन्दुओं को
जितनी अधिक गालियाँ,
आपकी झोली में
उतनी अधिक तालियाँ,
दूसरों को पुचकारो
करो लाड-प्यार,
आपके गले में होंगे
ढेर सारे
फूलों के हार,
यहाँ जो बात
हमने आपको बताई है,
यह कोई
मजाक नहीं
धर्मनिरपेक्ष भारतीय
राजनीति की सच्चाई है।

Friday, April 10, 2009

जूता फेंका हुआ बवाल

---- चुटकी----

जूता फेंका
हुआ बवाल
सज्जन,टाईटलर गए
अपने घर जी,
इसी को
कहतें हैं डेमोक्रेसी
व्हाट एन
आइडिया सर जी।

Thursday, April 9, 2009

भूत पिशाच निकट नहीं आवै


बुद्धि हीन तनु जानिके
सुमिरो पवन कुमार,
बल,बुद्धि,विद्या देहु मोहिं
हरहु कलेस विकार।

Wednesday, April 8, 2009

सिख समाज ने लड्डू बांटे

भारत के गृह मंत्री पी चिदंबरम पर जूता फेंकने वाले जरनैल सिंह के समर्थन में सिख समाज आगे आने लगा है। श्रीगंगानगर में इस समाज के अनेक व्यक्तियों ने गाँधी चौक पर लड्डू बांटे। "उन्होंने कहा, इस देश में सिखों के लिए इंसाफ ना मुमकिन है। सिख इस देश की अदालतों से भी नाउम्मीद हो गए हैं। ...........जमीर की आवाज पर सिख जो भी फैसला लेंगे विश्व जनमत उसकी अनदेखी नहीं कर पायेगा।" आगामी रणनीति तय करने के लिए सिख समाज की १२ अप्रैल को बैठक होगी। शाम को सोनिया गाँधी,जगदीश टाईटलर, सज्जन कुमार के पुतले जलाये जायेंगें। यहाँ की सिख संगत ने जरनैल सिंह को इक्यावन हजार रूपये का ईनाम देने का ऐलान किया है। इन सबके बीच यह सवाल जरुर जहाँ में आता है कि जरनैल सिंह के स्थान पर कोई गोविन्द,मोहन,राम लाल,लालू राम, छैला मल.........जैसा कोई आम आदमी होता तो क्या गृह मंत्री उसको माफ़ कर देते? चलो माफ़ करना और माफ़ी मांगना तो बडापन है, मगर क्या पुलिस और खुफिया विभाग उसको आधे घंटे में घर जाने देते? ये तो जरनैल सिंह सिख समाज का और पत्रकार था,ऊपर से चुनाव। बात वोटों की हो तो फ़िर क्या कहने।

Tuesday, April 7, 2009

शर्मसार हुई पत्रकारिता,नेता बने जरनैल सिंह

दैनिक जागरण के जरनैल सिंह नामक पत्रकार को आज सारी दुनिया जान गई। उनका समाज उनको मान गया होगा। इन सबके बीच पत्रकारिता पर ऐसा दाग लग गया जो कभी नही मिट सकता। पत्रकारिता कोई आसान और गैरजिम्मेदारी वाला पेशा नहीं है। ये तो वो काम है जिसके दम पर इतिहास बने और बनाये गये हैं। देश में यही वो स्तम्भ है जिस पर आम जनता आज भी विश्वास करती है। जिसकी कहीं सुनवाई नहीं होती वह मीडिया के पास आता है। वह इसलिए कि उसको विश्वास है कि मीडिया निष्पक्ष,संयमी और गरिमा युक्त होता है। मगर जरनैल सिंह ने इन सब बातों को झूठा साबित करने की शुरुआत कर दी। वह पत्रकारिता से ख़ुद विश्वास खो बैठा। पत्रकार की बजाए एक ऐसा आदमी बन गया जिसके अन्दर किसी बदले की आग लगी हुई थी। इस घटना से वह पत्रकारिता तो शर्मसार हो गई जिसके कारण जरनैल सिंह को पी चिदंबरम के पत्रकार सम्मलेन में जाने का मौका मिला। हाँ, जरनैल सिंह अपने समाज का नया लीडर जरुर बन गया। पत्रकार के रूप में जो वह नहीं पा सका होगा सम्भव है वह अब लीडर बन कर पा ले। हो सकता है कोई पार्टी उसको विधानसभा या लोकसभा के चुनाव में टिकट दे दे। ऐसे लोग पत्रकारिता के काबिल भी नहीं हो सकते जो इस प्रकार का आचरण करते हों। इस प्रकार का आचरण तो नेता करते हैं। शायद अब यही जरनैल सिंह किया करेंगें। जरनैल सिंह ने पत्रकारिता के साथ साथ "जागरण" ग्रुप की भी साख पर बट्टा लगाया है जिसका वह प्रेस कांफ्रेंस में प्रतिनिधित्व कर रहे थे। जरनैल सिंह को "हीरो" बनने पर बधाई और उनके आचरण पर शेम शेम।

ये कैसी सरकार!

---- चुटकी-----

ना घर
ना कार,
ये कैसी
"सरकार"

Monday, April 6, 2009

नारदमुनि को वापिस भेजा

धर्मराज के दरबार के अन्दर की कार्यवाही शुरू हो चुकी थी। उसके बाहर भीड़ के साथ मीडिया के लोग बड़ी संख्या में जमे हुए थे। कल की तरह यम् के दूत नारदमुनि को लेकर दरबार में हाजिर हुए। चित्रगुप्त ने कहा, महाराज फैसले से पहले कुछ पूछना चाहते हैं। इसका मुकदमे से कोई सम्बन्ध नहीं है। महाराज अपनी जिज्ञासा शांत करना चाहते हैं।
धर्मराज ने पूछा--ये राहुल कौन है? नारदमुनि--हिंदुस्तान के युवराज हैं महाराज। धर्मराज--तुम्हारा युवराज तो कमाल का है। उसके पास कार तक नहीं है। नारदमुनि--महाराज हिंदुस्तान में तो लाखों परिवार ऐसे हैं जिनके पास घर बार और रोटी तक नही है। फ़िर राहुल के पास तो सरकार है,उसको कार क्या करनी है। धर्मराज--लोगों के पास घर बार और रोटी नहीं है! ये तो भारत के न्यूज़ चैनल नहीं दिखा रहे। वे तो बार बार यही बता रहें है कि राहुल के पास कर नहीं है। नारदमुनि--महाराज आम आदमी के अभाव,दर्द,प्रताड़ना,उसके साथ होने वाला अन्याय ,जुल्म हिंदुस्तान में कोई ख़बर नहीं मानी जाती है। वहां का मीडिया तो बड़ों के लिए है।
धर्मराज--तो फ़िर.......... नारदमुनि--महाराज क्या क्या पूछोगे,मैं जानता हूँ मैं वहां कैसे रहता हूँ। एक जरा से झूठ की वजह से मुझे पकड़ कर यहाँ लाया गया। हिंदुस्तान में तो केवल और केवल झूठ की चलता है। सच तो इधर उधर झूठ के डर से दुबका रहता है। महाराज आप अपना फैसला सुनाओ। धर्मराज--तुमको आरोप मुक्त किया जाता है। दूत नारदमुनि को वापिस हिंदुस्तान भेज दिया जाए। दरबार में बैठे सभी देवी देवताओं के चेहरों पर मुस्कान दिखाई दी। चित्रगुप्त ने आकर मीडिया को फैसले की जानकारी दी। फ़िर वे शुरू हो गए अपने अपने अंदाज में।